19 अगस्त जन्म दिवस उत्तम साहित्य के प्रकाशक पुरुषोत्तम दास मोदी

19 अगस्त/जन्म-दिवस

उत्तम साहित्य के प्रकाशक : पुरुषोत्तम दास मोदी

सामान्य जन तक अच्छा साहित्य पहुँचाने के लिए लेखक, प्रकाशक और विक्रेता के बीच सन्तुलन और समझ होनी अति आवश्यक है। श्री पुरुषोत्तम दास मोदी एक ऐसे प्रकाशक थे, जिन्होंने प्रकाशन व्यवसाय में अच्छी प्रतिष्ठा पायी। उनका जन्म 19 अगस्त, 1928 को गोरखपुर में हुआ था। पुरुषोत्तम मास में जन्म लेेने से उनका यह नाम रखा गया। मोदी जी की रुचि छात्र जीवन से ही साहित्य की ओर थी। उनकी सारी शिक्षा गोरखपुर में हुई। उन्होंने हिन्दी में एम.ए. किया। विद्यालयों में होने वाले साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे सदा आगे रहते थे।

1945 में उनके संयोजन में सेण्ट एण्ड्रूज कालेज में विराट कवि सम्मेलन हुआ, जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सुमित्रा कुमारी सिन्हा जैसे वरिष्ठ कवि पधारे। इसमें तब के युवा कवि धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त आदि ने भी काव्यपाठ किया। ऐसी गतिविधियों के कारण मोदी जी का सम्पर्क तत्कालीन श्रेष्ठ साहित्यकारों से हो गया।

1950 में शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने घरेलू वस्त्र व्यवसाय के बदले प्रकाशन व्यवसाय में हाथ डाला, चूँकि इससे उनकी साहित्यिक क्षुधा शान्त होती थी। उन्होंने नये और पुराने लेखकों से सम्पर्क किया। 1956 में उन्होंने शिवानी का प्रथम उपन्यास ‘चौदह फेरे’ प्रकाशित किया। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी और शिवानी के कथा संग्रह प्रकाशित किये। उन दिनों गोरखपुर में मुद्रण सम्बन्धी सुविधाएँ कम थीं। अतः 1964 में वे विद्या की नगरी काशी आ गये।

यहाँ उन्होंने महामहोपाध्याय पण्डित गोपीनाथ कविराज, पण्डित बलदेव उपाध्याय, ठाकुर जयदेव सिंह, डा. मोतीचन्द, डा. भगीरथ मिश्र जैसे प्रतिष्ठित लेखकों की पुस्तकें छापीं। इससे उनके संस्थान ‘विश्वविद्यालय प्रकाशन’ की प्रतिष्ठा में चार चाँद लग गये। अपनी प्रकाशन और प्रबन्ध क्षमता के कारण वे ‘अखिल भारतीय प्रकाशक संघ’ के लगातार दो बार महामन्त्री भी बने।

मोदी जी का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं था। उनकी इच्छा थी कि व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध और श्रेष्ठ साहित्य जनता तक पहुँचे। इसके लिए वे स्वयं पुस्तकों के प्रूफ जाँचा करते थे। जो कार्य आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका को माध्यम बनाकर किया, वही काम मोदी जी ने अपने प्रकाशन में रहते हुए किया। उन्होंने हजारों ग्रन्थों की भाषा शुद्ध की।

मोदी जी बड़े सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे। जब उनकी माताजी का देहान्त हुआ, तो घर में ढेरों मेहमान आये थे। उन दिनों गैस की बड़ी समस्या थी। उनकी पत्नी ने पाँच रुपये अधिक देकर एक सिलेण्डर मँगा लिया। जब मोदी जी को यह पता लगा, तो उन्होंने तुरन्त कर्मचारी के हाथ वह गैस सिलेण्डर वापस भिजवाया। उनका सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं से भी बहुत लगाव था। काशी में हिन्दू सेवा सदन, मारवाड़ी अस्पताल, काशी गौशाला, मुमुक्ष भवन जैसी अनेक संस्थाओं को उन्होंने नवजीवन प्रदान किया।

अपने प्रकाशन की जानकारी सर्वदूर पहुँचाने के लिए उन्होंने ‘भारतीय वांगमय’ नामक एक मासिक लघु पत्रिका भी निकाली। इसमें उनके सम्पादकीय बहुत सामयिक हुआ करते थे। उन्होंने अन्तिम सम्पादकीय श्रीरामसेतु विवाद पर शासन को सद्बुद्धि देने के लिए लिखा था। अनेक रोगों से घिरे होने पर भी वे सदा सक्रिय रहते थे। सात अक्तूबर, 2007 को उनका देहान्त हो गया।
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19 अगस्त/जन्म-दिवस

महासती रूपकंवर माता

पिछले कुछ समय से सती के बारे में भ्रामक धारणा बन गयी है। लोग अपने पति के शव के साथ जलने वाली नारी को ही सती कहने लगे हैं, जबकि सत्य यह है कि इस प्रकार देहत्याग की परम्परा राजस्थान में तब पड़ी, जब विदेशी और विधर्मी मुगलों से युद्ध में बड़ी संख्या में हिन्दू सैनिक मारे जाते थे। उनकी पत्नियाँ शत्रुओं द्वारा भ्रष्ट होने के भय से अपनी देहत्याग देती थीं; यह परम्परा वैदिक नहीं है और समय के साथ ही समाप्त हो गयी।

सच तो यह है कि जो नारी मन, वचन और कर्म से अपने पति, परिवार, समाज और धर्म पर दृढ़ रहे, उसे ही सती का स्थान दिया जाता था। इसीलिए भारतीय धर्मग्रन्थों में सती सीता, सावित्री आदि की चर्चा होती रही है। वीरभूमि राजस्थान में ऐसी ही एक महासती रूपकँवर हुई हैं। उनका जन्म जोधपुर जिले के रावणियाँ गाँव में 19 अगस्त, 1903 (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) को हुआ था। उनकी स्मृति में अब वह गाँव ‘रूपनगर’ कहलाता है।

रूपकँवर के पिता श्री लालसिंह तथा माता श्रीमती जड़ाव कँवर थीं। बचपन से ही उसकी रुचि धर्म एवं पूजा पाठ के प्रति बहुत थी। रूपकँवर के ताऊ श्री चन्द्रसिंह घर के बाहर बने शिवलिंग की पूजा में अपना अधिकांश समय बिताते थे। उनका प्रभाव रूपकँवर पर पड़ा। उन्हें वह अपना प्रथम गुरु मानती थीं। 10 मई, 1919 को रूपकँवर का विवाह बालागाँव निवासी जुझारसिंह से हुआ; पर केवल 15 दिन बाद ही वह विधवा हो गयी।

लेकिन रूपकँवर ने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने पूरा जीवन विधवा की भाँति बिताने का निश्चय किया। वह भूमि पर सोती तथा एक समय भोजन करती थीं। घरेलू काम के बाद शेष समय वह भजन में बिताने लगीं। 15 फरवरी, 1942 को उन्हें कुछ विशेष आध्यात्मिक अनुभूति हुई। लोगों ने देखा कि उनकी वाणी से चमत्कार होने लगे हैं। उन्होंने गाँव के चम्पालाल व्यापारी के पुत्र गजराज तथा महन्त दर्शन राम जी को मृत्यु के बाद भी जिला दिया।

यह देखकर लोग उन्हें जीवित सती माता मानकर ‘बापजी’ कहने लगे। वे अधिकांश समय मौन रहतीं। उन्होंने सन्त गुलाबदास जी महाराज से दीक्षा ली और श्वेत वस्त्र धारण कर लिये। उन्होंने आहार लेना बन्द कर दिया। लोगों ने उनकी खूब परीक्षा ली; पर वे पवहारी बाबा की तरह बिना खाये पिये केवल हवा के सहारे ही जीवनयापन करती रहीं। उन्होंने दो बार तीर्थयात्रा भी की।

मान्यता यह है कि उन्हें भगवान शंकर ने दर्शन दिये थे। जिस स्थान पर उन्हें दर्शन हुए, वहाँ उन्होंने शिवमन्दिर बनवाया और 18 जनवरी, 1948 को उसमें मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की। उन्होंने एक अखण्ड ज्योति की स्थापना की, जो आज तक जल रही है। उसकी विशेषता यह है कि बन्द आले में जलने के बावजूद वहाँ काजल एकत्र नहीं होता। वे कभी पैसे को छूती नहीं थी, उनका कहना था कि इससे उन्हें बिच्छू के डंक जैसा अनुभव होता है।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद इनके भक्त थे। उनके आग्रह पर वे सात दिन राष्ट्रपति भवन में रहीं। भोपालगढ़ में गोशाला के उद्घाटन में हवन के लिए उन्होंने एक बछिया को दुह कर दूध निकाला। वह बछिया अगले 14 साल तक प्रतिदिन एक लोटा दूध देती रही। ऐसी महासती माता रूपकँवर ने पहले से ही निर्धारित एवं घोषित दिन 16 नवम्बर, 1986 (कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, विक्रमी संवत् 2043) को महासमाधि ले ली।
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19 अगस्त/बलिदान-दिवस

देवनागरी के नवदेवता बिनेश्वर ब्रह्म

पूर्वोत्तर भारत में चर्च के षड्यन्त्रों के अनेक रूप हैं। वे हिन्दू धर्म ही नहीं, तो हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के भी विरोधी हैं। ‘बोडो साहित्य सभा’ के अध्यक्ष श्री बिनेश्वर ब्रह्म भी उनके इसी षड्यन्त्र के शिकार बने, चूंकि वे बोडो भाषा के लिए रोमन लिपि की बजाय देवनागरी लिपि के प्रबल समर्थक थे।

श्री बिनरेश्वर ब्रह्म का जन्म 28 फरवरी, 1948 को असम में कोकराझार के पास भरतमुरी ग्राम में श्री तारामुनी एवं श्रीमती सानाथी ब्रह्म के घर में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा उन्होंने अपने गांव से ही पूरी की। 1965 में कोकराझार से हाई स्कूल करते हुए उन्होंने ‘हिन्दी विशारद’ की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली।

1971 में असम की सभी स्थानीय भाषाओं के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए हुए आंदोलन में वे 45 दिन तक डिब्रूगढ़ जेल में भी रहे। प्रारम्भ में कुछ वर्ष वे डेबरगांव तथा कोकराझार में हिन्दी के अध्यापक रहे। 1972 में उन्होंने जोरहाट से कृषि विज्ञान में बी.एस-सी. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे कृषि विभाग की सरकारी सेवा में आ गये। कोकराझार तथा जोरहाट में पढ़ते समय वे उन विद्यालयों की छात्र इकाई के सचिव भी चुने गये।

साहित्य के प्रति प्रेम होने के कारण उन्होंने गद्य और पद्य की कई पुस्तकों का सृजन किया। ‘बोडो साहित्य सभा’ में उनकी सक्रियता को देखकर उन्हें क्रमशः उसका सचिव, उपाध्यक्ष तथा फिर अध्यक्ष बनाया गया। असम में बोडो भाषा की लिपि के लिए कई बार आंदोलन हुए। श्री बिनेश्वर ब्रह्म ने सदा इसके लिए देवनागरी का समर्थन किया। उनके प्रयासों से इसे स्वीकार भी कर लिया गया; पर चर्च के समर्थक बार-बार इस विषय को उठाकर देवनागरी की बजाय रोमन लिपि लाने का प्रयास करते रहे।

पूर्वोत्तर भारत सदा से ही चर्च के निशाने पर रहा है। वहां सैकड़ों आतंकी गिरोह कार्यरत हैं। उनमें से अधिकांश को देशी-विदेशी चर्च का समर्थन मिलता है। इनके ‘कमांडर’ तथा अधिकांश बड़े नेता ईसाई ही हैं। सरकारी अधिकारी, व्यापारी तथा उद्योगपतियों से फिरौती वसूलना इनका मुख्य धंधा है। इसी से इनकी अवैध गतिविधियां चलती हैं। ईसाई वोट खोने के भय से सेक्यूलरवादी राज्य और केन्द्र शासन भी इनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं करते।

एन.डी.एफ.बी. (नेशनल डैमोक्रैटिक फ्रंट आॅफ बोडोलैंड) चर्चप्रेरित ऐसा ही एक उग्रवादी गिरोह है। यह बंदूक के बल पर बोडो जनजाति के लोगों को ईसाई बनाता है। अपनी मांगों को पूरा करने के लिए यह हत्या, अपहरण, बम विस्फोट तथा जबरन धन वसूली जैसे अवैध काम भी करता रहता है।

यह गिरोह काफी समय से ‘स्वतन्त्र बोडोलैंड’ राज्य की मांग के लिए हिंसक आंदोलन कर रहा है; पर आम जनता इनके साथ नहीं है। श्री बिनेश्वर ब्रह्म ने अपने प्रयासों से कई बार इन उग्रवादी गुटों तथा असम सरकार में वार्ता कराई, जिससे समस्याओं का समाधान शांतिपूर्वक हो सके।

देवनागरी के समर्थक होने के कारण श्री ब्रह्म को ईसाई उग्रवादियों की ओर से धमकी मिलती रहती थी; पर उन्होंने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। वे देवनागरी को सभी भारतीय भाषाओं के बीच सम्बन्ध बढ़ाने वाला सेतु मानते थे। उनके प्रयास से बोडो पुस्तकें देवनागरी लिपि में छपकर लोकप्रिय होने लगीं। इससे उग्रवादी बौखला गये और 19 अगस्त, 2000 की रात में उनके निवास पर ही गोलीवर्षा कर उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी।

इस हत्याकांड के बाद एन.डी.एफ.बी. ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए श्री बिनेश्वर ब्रह्म को ‘भारतीय जनता पार्टी’ का एजेंट बताया। देवनागरी के माथे पर अपने लहू का तिलक लगाने वाले ऐसे बलिदानी नवदेवता स्तुत्य हैं।

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