मिर्जा राजा जय सिंह के आग्रह पर शिवाजी ने आगरा में औरंगजेब से मिलने का निश्चय कर लिया उनकी योजना थी की औरंगजेब का वध उसके दरबार में ही कर दें जिससे सारे देश में फैला मुस्लिम आतंक मिट जाए अंत अपने पुत्र संभाजी और 350 विश्वास सैनिकों के साथ वे आगरा चले जाएं

17 अगस्त/इतिहास-स्मृति

और वे निकल भागे

मिर्जा राजा जयसिंह के आग्रह पर शिवाजी ने आगरा में औरंगजेब से मिलने का निश्चय कर लिया। उनकी योजना थी कि औरंगजेब का वध उसके दरबार में ही कर दें, जिससे सारे देश में फैला मुस्लिम आतंक मिट जाये। अतः अपने पुत्र सम्भाजी और 350 विश्वस्त सैनिकों के साथ वे आगरा चल दिये।

पर औरंगजेब तो जन्मजात धूर्त था। उसने दरबार में शिवाजी का अपमान किया और पिता-पुत्र दोनों को पकड़कर जेल में डाल दिया। अब वह इन दोनों को यहीं समाप्त करने की योजना बनाने लगा। शिवाजी समझ गये कि अधिक दिन तक यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है। आगरा तक के मार्ग में उनके विश्वस्त लोग तथा समर्थ स्वामी रामदास द्वारा स्थापित अखाड़े विद्यमान थे। इसी आधार पर उन्होंने योजना बनायी।

कुछ ही दिन में यह सूचना फैल गयी कि शिवाजी बहुत बीमार हैं। उन्हें कोई ऐसा रोग हुआ है कि दिन-प्रतिदिन वजन कम हो रहा है। उनके साथ आये हुए वैद्य ही नहीं, आगरा नगर के वैद्य भी निराश हो गये हैं। औरंगजेब यह जानकर बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि यह काँटा तो स्वयं ही निकला जा रहा है; पर उधर तो कुछ और तैयारियाँ हो रही थीं।

शिवाजी ने खबर भिजवायी कि वे अन्त समय में कुछ दान-पुण्य करना चाहते हैं। औरंगजेब को भला क्या आपत्ति हो सकती थी ? हर दिन मिठाइयों से भरे 20-30 टोकरे शिवाजी के कमरे तक आते। शिवाजी उन्हें हाथ से स्पर्श कर देते। जाते समय जेल के द्वार पर एक-एक टोकरे की तलाशी होती और फिर उन्हें गरीबों और भिखारियों में बँटवा दिया जाता।

कई दिन ऐसे ही बीत गये। 17 अगस्त, 1666 फरारी की तिथि निश्चित की गयी थी। दो दिन पूर्व ही व्यवस्था के लिए कुछ खास साथी बाहर चले गये। वह दिन आया। आज दो टोकरों में शिवाजी और सम्भाजी बैठे। शिवाजी की हीरे की अँगूठी पहनकर हिरोजी फर्जन्द चादर ओढ़कर बिस्तर पर लेट गया। नाटक में कमी न रह जाये, इसलिए शिवाजी का अति विश्वस्त सेवक मदारी मेहतर उनके पाँव दबाने लगा। कहारों ने टोकरे उठाये और द्वार पर पहुँच गये।

इतने दिन से यह सब चलने के कारण पहरेदार लापरवाह हो गये थे। उन्होंने एक-दो टोकरों में झाँककर देखा, फिर सबको जाने दिया। मिठाई वाली टोकरियाँ गरीब बस्तियों में पहुँचा दी गयीं; पर शेष दोनों नगर के बाहर। वहाँ शिवाजी के साथी घोड़े लेकर तैयार थे। रात में ही सब सुरक्षित मथुरा पहुँच गये।

काफी समय बीतने पर बिस्तर पर लम्बाई में तकिये लगाकर उस पर चादर ढक दी गयी। अब हिरोजी और मदारी भी दवा लाने बाहर निकल गये। रात भर जबरदस्त पहरा चलता रहा। सुबह जब यह भेद खुला, तो सबके होश उड़ गये। चारों ओर घुड़सवार दौड़ाये गये; पर अब तो प॰छी उड़ चुका था।

शिवाजी ने सम्भाजी को मथुरा में ही कृष्णाजी त्रिमल के पास छोड़ दिया और स्वयं साधु वेष में पुणे की ओर चल दिये। मार्ग में अनेक बार वे संकट में फँसे; पर कहीं धनबल और कहीं बुद्धिबल से वे बच निकले। 20 नवम्बर को एक साधु ने जीजामाता के चरणों में जब माथा टेका, तो माता की आँखें भर आयीं। वे शिवाजी ही थे।

कुछ दिन बाद सम्भाजी को भी सकुशल बुलवा लिया गया।

(संदर्भ : युगावतार – श्री हो.वे.शेषाद्रि)
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17 अगस्त/पुण्य-तिथि

आधुनिक भगीरथ : दशरथ मांझी

स्वर्ग से धरती पर गंगा लाने वाले तपस्वी राजा भगीरथ को कौन नहीं जानता। उनके प्रयासों के कारण ही भारत के लोग लाखों साल से माँ गंगा में स्नान, पूजन और आचमन से पवित्र हो रहे हैं। आज भी यदि कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से लगातार किसी सद् संकल्प को लेकर काम करता रहे, तो उसे भगीरथ ही कहते हैं। ऐसे ही एक आधुनिक भगीरथ थे, दशरथ मांझी।

दशरथ मांझी का जन्म कब हुआ, यह तो पता नहीं; पर वे बिहार के गया प्रखण्ड स्थित गहलौर घाटी में रहते थे। उनके गांव अतरी और शहर के बीच में एक पहाड़ था, जिसे पार करने के लिए 20 कि.मी का चक्कर लगाना पड़ता था। 1960 ई. में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गये; पर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सके, जिससे उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी।

बस, बात दशरथ के मन को लग गयी। उन्होंने निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई है, मैं उसे काटकर उसके बीच से रास्ता बनाऊंगा, जिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का ग्रास न बनना पड़े। उसके बाद सुबह होते ही दशरथ औजार लेकर जुट जाते और पहाड़ तोड़ना शुरू कर देते। सुबह से दोपहर होती और फिर शाम; पर दशरथ पसीना बहाते रहते। अंधेरा होने पर ही वे घर लौटते। लोग समझे कि पत्नी की मृत्यु से इनके मन-मस्तिष्क पर चोट लगी है। उन्होंने कई बार दशरथ को समझाना चाहा; पर वे उनके संकल्प को शिथिल नहीं कर सके।

अन्ततः 22 साल के लगातार परिश्रम के बाद पहाड़ ने हार मान ली। दशरथ की छेनी, हथौड़ी के आगे 1982 में पहाड़ ने घुटने टेक दिये और रास्ता दे दिया। यद्यपि तब तक दशरथ मांझी का यौवन बीत चुका था; पर 20 कि.मी की बजाय अब केवल एक कि.मी. की पगडण्डी से शहर पहुंचना संभव हो गया। तब मजाक उड़ाने वाले लोगों को उनके दृढ़ संकल्प के आगे नतमस्तक होना पड़ा। अब लोग उन्हें ‘साधु बाबा’ के नाम से बुलाने लगे।

दशरथ बाबा इसके बाद भी शान्त नहीं बैठे। अब उनकी इच्छा थी कि यह रास्ता पक्का हो जाये, जिससे पैदल की बजाय लोग वाहनों से इस पर चल सकें। इससे श्रम और समय की भारी बचत हो सकती थी; पर इसके लिए उन्हें शासन और प्रशासन की जटिलताओं से लड़ना पड़ा। वे एक बार गया से पैदल दिल्ली भी गये; पर सड़क पक्की नहीं हुई। उनके नाम की चर्चा पटना में सत्ता के गलियारों तक पहुंच तो गयी; पर निष्कर्ष कुछ नहीं निकला।

इन्हीं सब समस्याओं से लड़ते हुए दशरथ बाबा बीमार पड़ गये। क्षेत्र में उनके सम्मान को देखते हुए राज्य प्रशासन ने उन्हें दिल्ली के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 17 अगस्त, 2007 को उन्होंने अन्तिम सांस ली।

देहांत के बाद उनका पार्थिव शरीर गांव लाया गया। गया रेलवे स्टेशन पर बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी कर्मभूमि गहलौर घाटी में ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें भू समाधि दी गयी। राज्य शासन ने ‘पद्मश्री’ के लिए भी उनके नाम की अनुशंसा की।

दशरथ मांझी की मृत्यु के बाद बिहार के बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में एक पाठ जोड़ा गया है। उसका शीर्षक है – पहाड़ से ऊंचा आदमी। यह बात दूसरी है कि पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने वाले इस आधुनिक भगीरथ के संकल्प का मूल्य उनके जीवित रहते प्रशासन नहीं समझा।
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17 अगस्त/बलिदान-दिवस

वजीर रामसिंह पठानिया

अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध भारत के चप्पे-चप्पे पर वीरों ने संग्राम किया है। हिमाचल प्रदेश की नूरपूर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया ने 1848 में ही स्वतन्त्रता का बिगुल फूँक दिया था। इनका जन्म वजीर शामसिंह एवं इन्दौरी देवी के घर 1824 में हुआ था। पिता के बाद इन्होंने 1848 में वजीर का पद सम्भाला। उस समय रियासत के राजा वीरसिंह का देहान्त हो चुका था। उनका बेटा जसवन्त सिंह केवल दस साल का था।

अंग्रेजों ने जसवन्त सिंह को नाबालिग बताकर राजा मानने से इन्कार कर दिया तथा उसकी 20,000 रु. वार्षिक पेन्शन निर्धारित कर दी। इस पर रामसिंह बौखला गये। उन्होंने जम्मू से मनहास, जसवाँ से जसरोटिये, अपने क्षेत्र से पठानिये और कटोच राजपूतों को एकत्र किया। पंजाब से सरनाचन्द 500 हरिचन्द राजपूतों को ले आया। 14 अगस्त, 1848 की रात में सबने शाहपुर कण्डी दुर्ग पर हमला बोल दिया। वह दुर्ग उस समय अंग्रेजों के अधिकार में था। भारी मारकाट के बाद 15 अगस्त को रामसिंह ने अंग्रेजी सेना को खदेड़कर दुर्ग पर अपना झण्डा लहरा दिया।

इसके बाद रामसिंह ने सब ओर ढोल पिटवाकर मुनादी करवाई कि नूरपूर रियासत से अंग्रेजी राज्य समाप्त हो गया है। रियासत का राजा जसवन्त सिंह है और मैं उनका वजीर। इस घोषणा से पहाड़ी राजाओं में उत्साह की लहर दौड़ गयी। वे सब भी रामसिंह के झण्डे के नीचे आने लगे; लेकिन अंग्रेजों ने और रसद लेकर फिर से दुर्ग पर धावा बोल दिया। शस्त्रास्त्र के अभाव में रामसिंह को दुर्ग छोड़ना पड़ा; पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

वे पंजाब के रास्ते गुजरात गये और रसूल के कमाण्डर से 1,000 सिख सैनिक और रसद लेकर लौटे। इनकी सहायता से उन्होंने फिर से दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजी सेना पठानकोट भाग गयी। यह सुनकर जसवाँ, दातारपुर, कांगड़ा तथा ऊना के शासकों ने भी स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया; पर अंग्रेज भी कम नहीं थे, उन्होंने कोलकाता से कुमुक बुलाकर फिर हमला किया। रामसिंह पठानिया को एक बार फिर दुर्ग छोड़ना पड़ा। उन्होंने राजा शेरसिंह के 500 वीर सैनिकों की सहायता से ‘डल्ले की धार’ पर मोर्चा बाँधा। अंग्रेजों ने ‘कुमणी दे बैल’ में डेरा डाल दिया।

दोनों दलों में मुकेसर और मरीकोट के जंगलों में भीषण युद्ध हुआ। रामसिंह पठानिया की ‘चण्डी’ नामक तलवार 25 सेर वजन की थी। उसे लेकर वे जिधर घूमते, उधर ही अंग्रेजों का सफाया हो जाता। भीषण युद्ध का समाचार कोलकाता पहुँचा, तो ब्रिगेडियर व्हीलर के नेतृत्व में नयी सेना आ गयी। अब रामसिंह चारों ओर से घिर गये। ब्रिटिश रानी विक्टोरिया का भतीजा जॉन पील पुरस्कार पाने के लिए स्वयं ही रामसिंह को पकड़ने बढ़ा; पर चण्डी के एक वार से वह धराशायी हो गया।

अब कई अंग्रेजों ने मिलकर षड्यन्त्रपूर्वक घायल वीर रामसिंह को पकड़ लिया। उन पर फौजी अदालत में मुकदमा चलाकर आजीवन कारावास के लिए पहले सिंगापुर और फिर रंगून भेज दिया गया। रंगून की जेल में ही मातृभूमि को याद करते हुए उन्होंने 17 अगस्त, 1849 को अपने प्राण त्याग दिये।

‘डल्ले की धार’ पर लगा शिलालेख आज भी उस वीर की याद दिलाता है। नूरपुर के जनमानस में इनकी वीरगाथा ‘रामसिंह पठानिया की वार’ के नाम से गायी जाती है।
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17 अगस्त/बलिदान-दिवस

अमर बलिदानी : मदनलाल धींगड़ा

तेजस्वी तथा लक्ष्यप्रेरित लोग किसी के जीवन को कैसे बदल सकते हैं, मदनलाल धींगड़ा इसका उदाहरण है। उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। उनके पिता तथा भाई वहाँ प्रसिद्ध चिकित्सक थे। बी.ए. करने के बाद मदनलाल को उन्होंने लन्दन भेज दिया। वहाँ उसे क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इण्डिया हाउस’ में एक कमरा मिल गया।

उन दिनों विनायक दामोदर सावरकर भी वहीं थे। 10 मई, 1908 को इण्डिया हाउस में 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की अर्द्धशताब्दी मनायी गयी। उसमें बलिदानी वीरों को श्रद्धा॰जलि दी गयी तथा सभी को स्वाधीनता के बैज भेंट दिये गये। सावरकर जी के भाषण ने मदनलाल के मन में हलचल मचा दी।

अगले दिन बैज लगाकर वह जब क१लिज गया, तो अंग्रेज छात्र मारपीट करने लगे। धींगड़ा का मन बदले की आग में जल उठा। उसने वापस आकर सावरकर जी को सब बताया। उन्होंने पूछा, क्या तुम कुछ कष्ट उठा सकते हो ? मदनलाल ने अपना हाथ मेज पर रख दिया। सावरकर के हाथ में एक सूजा था। उन्होंने वह उसके हाथ पर दे मारा। सूजा एक क्षण में पार हो गया; पर मदनलाल ने उफ तक नहीं की। सावरकर ने उसे गले लगा लिया। फिर तो दोनों में ऐसा प्रेम हुआ कि राग-रंग में डूबे रहने वाले मदनलाल का जीवन बदल गया।

सावरकर की योजना से मदनलाल ‘इण्डिया हाउस’ छोड़कर एक अंग्रेज परिवार में रहने लगे। उन्होंने अंग्रेजों से मित्रता बढ़ायी; पर गुप्त रूप से वह शस्त्र संग्रह, उनका अभ्यास तथा शस्त्रों को भारत भेजने के काम में सावरकर जी के साथ लगे रहे। ब्रिटेन में भारत सचिव का सहायक कर्जन वायली था। वह विदेशों में चल रही भारतीय स्वतन्त्रता की गतिविधियों को कुचलने में स्वयं को गौरवान्वित समझता था। मदनलाल को उसे मारने का काम सौंपा गया।

मदनलाल ने एक कोल्ट रिवाल्वर तथा एक फ्रै॰च पिस्तौल खरीद ली। वह अंग्रेज समर्थक संस्था ‘इण्डियन नेशनल एसोसिएशन’ का सदस्य बन गया। एक जुलाई, 1909 को इस संस्था के वार्षिकोत्सव में कर्जन वायली मुख्य अतिथि था। मदनलाल भी सूट और टाई में सजकर म॰च के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गये। उनकी जेब में पिस्तौल, रिवाल्वर तथा दो चाकू थे। कार्यक्रम समाप्त होते ही मदनलाल ने म॰च के पास जाकर कर्जन वायली के सीने और चेहरे पर गोलियाँ दाग दीं। वह नीचे गिर गया। मदनलाल को पकड़ लिया गया। 5 जुलाई को इस हत्या की निन्दा में एक सभा हुई; पर सावरकर ने वहाँ निन्दा प्रस्ताव पारित नहीं होने दिया। उन्हें देखकर लोग भय से भाग खड़े हुए।

अब मदनलाल पर मुकदमा शुरू हुआ। मदनलाल ने कहा – मैंने जो किया है, वह बिल्कुल ठीक किया है। भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा जन्म फिर से भारत में ही हो। उन्होंने एक लिखित वक्तव्य भी दिया। शासन ने उसे वितरित नहीं किया; पर उसकी एक प्रति सावरकर के पास भी थी। उन्होंने उसे प्रसारित करा दिया। इससे ब्रिटिश राज्य की दुनिया भर में थू-थू हुई।

17 अगस्त, 1909 को पेण्टनविला जेल में मदनलाल धींगड़ा ने खूब बन-ठन कर भारत माता की जय बोलते हुए फाँसी का फन्दा चूम लिया। उस दिन वह बहुत प्रसन्न थे। इस घटना का इंग्लैण्ड के भारतीयों पर इतना प्रभाव पड़ा कि उस दिन सभी ने उपवास रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
………………………इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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