जल सेवक संत बलबीर सिंह सीचेवाल

16 जुलाई/स्मृति-दिवस

जल सेवक सन्त बलबीर सिंह सींचेवाल

भारत में सन्त, महात्माओं की छवि मुख्यतः धर्मोपदेशक की है; पर कुछ सन्त पर्यावरण संरक्षण, सड़क एवं विद्यालय निर्माण आदि द्वारा नर सेवा को ही नारायण सेवा मानते हैं। ऐसे ही एक सन्त हैं बलबीर सिंह सींचेवाल, जिन्होंने सिख पन्थ के प्रथम गुरु श्री नानकदेव के स्पर्श से पावन हुई ‘काली बेई’ नदी को शुद्ध कर दिखाया। यह नदी होशियारपुर जिले के धनोआ गाँव से निकलकर हरीकेपत्तन में रावी और व्यास नदी में विलीन होती है।

बलबीर सिंह जी ग्राम सींचेवाल के निवासी हैं। एक बार भ्रमण के दौरान उन्होंने सुल्तानपुर लोधी (जिला कपूरथला) गाँव के निकट बहती काली बेई नदी को देखा। वह इतनी प्रदूषित हो चुकी थी कि स्नान और आचमन करना तो दूर, उसे छूने से भी डर लगता था। दुर्गन्ध के कारण उसके निकट जाना भी कठिन था। 162 कि.मी. लम्बी नदी में निकटवर्ती 35 शहरों का मल-मूत्र एवं गन्दगी गिरती थी। नदी के आसपास की जमीनों को भ्रष्ट पटवारियों ने बेच दिया था या फिर उन पर अवैध कब्जे हो चुके थे। लोगों का ध्यान इस पवित्र नदी की स्वच्छता की ओर बिल्कुल नहीं था।

ऐसे में संकल्प के धनी बलबीर सिंह जी ने कारसेवा के माध्यम से इस नदी को शुद्ध करने का बीड़ा उठाया। उनके साथ 20-22 युवक भी आ जुटे। 16 जुलाई, 2001 ई0 को उन्होंने वाहे गुरु को स्मरण कर गुरुद्वारा बेर साहिब के प्राचीन घाट पर अपने साथियों के साथ नदी में प्रवेश किया; पर यह काम इतना आसान नहीं था। स्थानीय माफिया, राजनेताओं, शासन ही नहीं, तो गुरुद्वारा समिति वालों ने भी इसमें व्यवधान डालने का प्रयास किया। उन्हें लगा कि इस प्रकार तो हमारी चौधराहट ही समाप्त हो जाएगी। कुछ लोगों ने उन कारसेवकों से सफाई के उपकरण छीन लिये।

पर सन्त सींचेवाल ने धैर्य नहीं खोया। उनकी छवि क्षेत्र में बहुत उज्जवल थी। वे इससे पहले भी कई विद्यालय और सड़क बनवा चुके थे। उन्हें न राजनीति करनी थी और न ही किसी संस्था पर अधिकार। अतः उन्होंने जब प्रेम से लोगों को समझाया, तो बात बन गयी और फिर तो कारसेवा में सैकड़ों हाथ जुट गये। उन्होंने गन्दगी को शुद्ध कर खेतों में डलवाया, इससे खेतों को उत्तम खाद मिलने लगी और फसल भी अच्छी होने लगी। सबमर्सिबल पम्पों द्वारा भूमि से पानी निकालने की गति जब कम हुई, तो नदी का जल स्तर भी बढ़ने लगा। जब समाचार पत्रों में इसकी चर्चा हुई, तो हजारों लोग इस पुण्य कार्य में योगदान देने लगे।

सन्त जी ने न केवल नदी को शुद्ध किया, बल्कि उसके पास के 160 कि.मी लम्बे मार्ग का भी निर्माण कराया। किनारों पर फलदार पेड़ और सुन्दर सुगन्धित फूलों के बाग लगवाये। उन्हांेने पुराने घाटों की मरम्मत कराई और नये घाट बनवाये। नदी में नौकायन का प्रबन्ध कराया, जिससे लोगों का आवागमन उस ओर खूब होने लगा। इससे उनकी प्रसिद्धि चहुँ ओर फैल गयी।

होते-होते यह प्रसिद्धि तत्कालीन राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम तक पहुँची। वे एक वैज्ञानिक होने के साथ ही पर्यावरण प्रेमी भी हैं। 17 अगस्त, 2006 को वे स्वयं इस प्रकल्प को देखने आये। उन्होंने देखा कि यदि एक व्यक्ति ही सत्संकल्प से काम करे, तो वह असम्भव को सम्भव कर सकता है। सन्त जी को पर्यावरण के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं; पर वे विनम्र भाव से इसे गुरु कृपा का प्रसाद ही मानते हैं।


16 जुलाई/जन्म-दिवस

सबकेे शंकराचार्य पूज्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती

हिन्दू धर्म में शंकराचार्य का बहुत ऊँचा स्थान है। अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड एवं पूजा आदि के कारण प्रायः शंकराचार्य मन्दिर-मठ तक ही सीमित रहते हैं। शंकराचार्य की चार प्रमुख पीठों में से एक कांची अत्यधिक प्रतिष्ठित है। इसके शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती इन परम्पराओं को तोड़कर निर्धन बस्तियों में जाते हैं। इस प्रकार उन्होंने अपनी छवि अन्यों से अलग बनाई। हिन्दू संगठन के कार्यों में वे बहुत रुचि लेते हैं। यद्यपि इस कारण उन्हें अनेक गन्दे आरोपों का सामना कर जेल की यातनाएँ भी सहनी पड़ीं।

श्री जयेन्द्र सरस्वती का बचपन का नाम सुब्रह्मण्यम था। उनका जन्म 16 जुलाई, 1935 को तमिलनाडु के इरुलनीकी कस्बे में श्री महादेव अय्यर के घर में हुआ था। पिताजी ने उन्हें नौ वर्ष की अवस्था में वेदों के अध्ययन के लिए का॰ची कामकोटि मठ में भेज दिया। वहाँ उन्होंने छह वर्ष तक ऋग्वेद व अन्य ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। मठ के 68 वें आचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती ने उनकी प्रतिभा देखकर उन्हें उपनिषद पढ़ने को कहा। सम्भवतः वे सुब्रह्मण्यम में अपने भावी उत्तराधिकारी को देख रहे थे।

आगे चलकर उन्होंने अपने पिता के साथ अनेक तीर्थों की यात्रा की। वे भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए तिरुमला गये और वहाँ उन्होंने सिर मुण्डवा लिया। 22 मार्च, 1954 उनके जीवन का महत्वपूर्ण दिन था, जब उन्होंने संन्यास ग्रहण किया। सर्वतीर्थ तालाब में कमर तक जल में खड़े होकर उन्होंने प्रश्नोच्चारण मन्त्र का जाप किया और यज्ञोपवीत उतार कर स्वयं को सांसारिक जीवन से अलग कर लिया। इसके बाद वे अपने गुरु स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती द्वारा प्रदत्त भगवा वस्त्र पहन कर तालाब से बाहर आये।

इसके बाद 15 वर्ष तक उन्होंने वेद, व्याकरण मीमाँसा तथा न्यायशास्त्र का गहन अध्ययन किया। उनकी प्रखर साधना देखकर कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर उनका नाम जयेन्द्र सरस्वती रखा। अब उनका अधिकांश समय पूजा-पाठ में बीतने लगा; पर देश और धर्म की अवस्था देखकर कभी-कभी उनका मन बहुत बेचैन हो उठता था। वे सोचते थे कि चारों ओर से हिन्दू समाज पर संकट घिरे हैं; पर हिन्दू समाज अपने स्वार्थ में ही व्यस्त है।

इन समस्याओं पर विचार करने के लिए वे एक बार मठ छोड़कर कुछ दिन के लिए एकान्त में चले गये। वहाँ से लौटकर उन्होेंने पूजा-पाठ एवं कर्मकाण्ड के काम अपने उत्तराधिकारी को सौंप दिये और स्वयं निर्धन हिन्दू बस्तियों में जाकर सेवा-कार्य प्रारम्भ करवाये। उन्हें लगता था कि इस माध्यम से ही निर्धन, अशिक्षित एवं व॰िचत हिन्दुओं का मन जीता जा सकता है।

उन्होंने मठ के पैसे एवं भक्तों के सहयोग से सैकड़ों विद्यालय एवं चिकित्सालय आदि खुलवाये। इससे तमिलनाडु में हिन्दू जाग्रत एवं संगठित होने लगे। धर्मान्तरण की गतिविधियों पर रोक लगी; पर न जाने क्यों वहाँ की मुख्यमन्त्री जयललिता अपनी सत्ता के मार्ग में उन्हें बाधक समझने लगी। उसने षड्यन्त्रपूर्वक उन्हें जेल में ठूँस दिया; पर न्यायालय में सब आरोप झूठ सिद्ध हुए। जनता ने भी अगले चुनाव में जयललिता को भारी पराजय दी। आज भी खराब स्वास्थ्य और वृद्धावस्था के बावजूद पूज्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती हिन्दू समाज की सेवा में लगे हैं। इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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