प्रखर पत्रकार प्रभास जोशी

15 जुलाई /जन्म-दिवस

प्रखर पत्रकार : प्रभाष जोशी

स्वाधीन भारत में जिन पत्रकारों ने विशिष्ट पहचान बनाई, उनमें प्रभाष जोशी भी एक हैं। उनका जन्म 15 जुलाई 1937 को म.प्र. के मालवा क्षेत्र में हुआ था। छात्र जीवन से ही वे गांधी, सर्वोदय और विनोबा से जुड़ गये। उन्होंने विनोबा के साथ रहकर भूदान आंदोलन के समाचार जुटाये। फिर उन्होंने इंदौर से प्रकाशित ‘नई दुनिया’ में बाबा राहुल बारपुते की देखरेख में पत्रकारिता के गुर सीखे और भोपाल के ‘मध्य देश’ से जुड़े।

जयप्रकाश नारायण ने जब 1972 में दस्यु माधोसिंह का आत्मसमर्पण कराया, तो प्रभाष जी भी साथ थे। सर्वोदय जगत, प्रजानीति, आसपास, इंडियन एक्सप्रेस आदि में वे अनेक दायित्वों पर रहे। हिन्दी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। लेखन में वे स्थानीय लोकभाषा के शब्दों का खूब प्रयोग करते थे।

1983 में एक्सप्रेस समूह ने प्रभाष जोशी के संपादकत्व में दिल्ली से ‘जनसत्ता’ प्रकाशित किया। प्रभाष जी ने युवा पत्रकारों की टोली बनाकर उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम करने दिया। शुद्ध और साहित्यिक, पर सरल हिन्दी जनसत्ता की विशेषता थी। उसमें साहित्य, कला व संस्कृति के साथ ही सामयिक विषयों पर मौलिक हिन्दी लेख छपते थे, अंग्रेजी लेखकों की जूठन नहीं।

उन्होेंने हिन्दी अखबारों की भेड़चाल से अलग रहकर नागरी अंकावली का ही प्रयोग किया। सम्पादकीय विचार अलग होने पर भी समाचार वे निष्पक्ष रूप से देते थे। इससे शीघ्र ही जनसत्ता लोकप्रिय हो गया। धीरे-धीरे प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक-दूसरे के पर्याय बन गये।

कबीर, क्रिकेट और कुमार गंधर्व के शास्त्रीय गायन के प्रेमी होने के कारण वे इन पर खूब लिखते थे। एक दिवसीय कोे ‘फटाफट क्रिकेट’ और 20 ओवर वाले मैच को उन्होंने ‘बीसम बीस’ की उपमा दी। जन समस्याओं को वे गोष्ठियों से लेकर सड़क तक उठाते थे। उनका प्रायः सभी बड़े राजनेताओें से संबंध थे। वे प्रशंसा के साथ ही उनकी खुली आलोचना भी करते थे।

उन्होंने आपातकाल का तीव्र विरोध किया। राजीव गांधी के भ्रष्टाचार के विरोध में वी.पी. सिंह के बोफोर्स आंदोलन तथा फिर राममंदिर आंदोलन का उन्होंने साथ दिया। चुटीले एवं मार्मिक शीर्षक के कारण उनके लेख सदा पठनीय होते थे। जनसत्ता में हर रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ उनका लोकप्रिय स्तम्भ था। वे हंसी में स्वयं को ‘ढिंढोरची’ कहते थे, जो सब तक खबर पहुंचाता है।

राममंदिर आंदोलन में एक समय वे वि.हि.प. और सरकार के बीच कड़ी बन गये थे; पर 6 दिसम्बर, 1992 को अचानक हिन्दू युवाओं के आक्रोश से बाबरी ढांचा ध्वस्त हो गया। उन्हें लगा कि यह सब योजनाबद्ध था। इससे उन्होंने स्वयं को अपमानित अनुभव किया और फिर उनकी कलम और वाणी सदा संघ विचार के विरोध में ही चलती रही। धीरे-धीरे जनसत्ता वामपंथी स्वभाव का पत्र बन गया और उसकी लोकप्रियता घटती गयी। कुछ के मतानुसार भा.ज.पा. ने उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा, इससे वे नाराज थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में कई अखबारों ने प्रत्याशियों सेे पैसे लेकर विज्ञापन के रूप में समाचार छापे, इसके विरुद्ध उग्र लेख लिखकर उन्होंने पत्रकारों और जनता को जाग्रत किया।

प्रभाष जी का शरीर अनेक रोगों का घर था। उनकी बाइपास सर्जरी हो चुकी थी। 5 नवम्बर, 2009 को हैदराबाद में भारत और ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हुआ। प्रभाष जी उसे दूरदर्शन पर देख रहे थे। सचिन तेंदुलकर ने 175 रन बनाये, इससे वे बहुत प्रफुल्लित हुए; पर अचानक उसके आउट होने और तीन रन से भारत की हार का झटका उनका दिल नहीं सह सका और अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही उनका प्राणांत हो गया। इस प्रकार एक प्रखर पत्रकार की वाणी और लेखनी सदा के लिए शांत हो गयी।
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15 जुलाई/जन्म-दिवस

संघ समर्पित रामलखन सिंह

संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रामलखन सिंह का जन्म 15 जुलाई, 1939 को ग्राम धंधापार (जिला सिद्धार्थ नगर, उ.प्र.) के एक सामान्य कृषक श्री रामनारायण सिंह के घर में हुआ था। जब वे छोटे ही थे, तब इनकी माता जी तथा फिर पिता जी का भी निधन हो गया। इससे रामलखन जी तथा उनके बड़े भाई वासुदेव सिंह पर भारी संकट आ गया। ऐसे में ग्राम अपार, पो. छरहटा निवासी उनकी मौसी श्रीमती आंचल देवी उन्हें अपने साथ ले गयीं।

रामलखन जी की प्राथमिक शिक्षा ग्राम अपार में ही हुई। इसके बाद उन्होंने तिलक इंटर कॉलिज, बांसी से हाई स्कूल और इंटर किया। इसी दौरान 1950 में उनका संपर्क संघ से हुआ। इसमें मुख्य भूमिका श्री केसरीधर जी तथा ठाकुर संकठाप्रसाद जी की थी। इसके बाद पढ़ाई और संघ का काम साथ-साथ चलता रहा। क्रमशः उन्होंने गटनायक से लेकर मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, सायं कार्यवाह और नगर कार्यवाह जैसी जिम्मेदारियां निभाईं। 1962 में एम.ए. की पढ़ाई पूर्ण कर उन्होंने प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया।

रामलखन जी ने 1958, 1962 और फिर 1966 में संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण लिये। प्रचारक जीवन में वे मेहदावल, बस्ती, राबर्ट्सगंज, मिर्जापुर के बाद 1974 में सुल्तानपुर के जिला प्रचारक बनाये गये। अगले ही साल देश में आपातकाल लग गया। इस दौरान वे सुल्तानपुर, फैजाबाद तथा प्रतापगढ़ में भूमिगत रहकर काम करते रहे। आपातकाल के बाद वे बांदा, बाराबंकी तथा उन्नाव में जिला प्रचारक तथा फिर गोंडा और झांसी में विभाग प्रचारक रहे। बीच में कुछ वर्ष वे लखनऊ में ‘भारती भवन’ के कार्यालय प्रमुख भी रहे।

संघ के चहुंदिश विस्तार के साथ ही शाखा के अलावा और भी कई तरह के काम बढ़ने लगे। इनमें से एक काम धर्म जागरण का भी है। जो लोग किसी लालच, भय या अपमान के कारण हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे मजहबों में चले गये थे, उनसे सम्पर्क कर उन्हें फिर से अपने पूर्वजों के पवित्र धर्म में लाना धर्म जागरण का काम है। जिन बस्तियों और गांवों में मुसलमान तबलीगी या ईसाई मिशनरी धर्मान्तरण कराने के लिए घूमते रहते हैं, वहां लोगों को अपने धर्म, पूर्वजों और संस्कृति के प्रति जागरूक करना भी महत्वपूर्ण होता है।

वर्ष 2004 में रामलखन जी को धर्म जागरण विभाग (पूर्वी उ.प्र.) का काम दिया गया। अगले 12 साल तक पूरे क्षेत्र में प्रवास कर वे इसे गति देते रहे। 2016 में स्वास्थ्य की समस्याओं को देखते हुए उन्हें सक्रिय काम से विश्राम दे दिया गया। वे मॉडल हाउस, लखनऊ में ‘केशव भवन’ कार्यालय पर रहने लगे। पांच फरवरी, 2018 को उनका स्वास्थ्य अचानक बहुत बिगड़ गया। अतः उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच से जलोदर और तपेदिक के साथ ही आंत, फेफड़े और यकृत में अनेक समस्याएं मिलीं। इन्हीं के कारण 20 फरवरी को संघ कार्यालय (केशव भवन) पर उनका निधन हुआ।

वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर संकठाप्रसाद जी का रामलखन जी पर बहुत प्रेम था। इसके साथ ही उन्होंने जब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की जीवनी पढ़ी, तो उससे वे बहुत प्रभावित हुए। इस प्रकार उनके प्रचारक बनने की भूमिका बनी, जो फिर जीवन की अंतिम सांस तक चलती रही। माता-पिता के अभाव में रामलखन जी ने अपने मौसेरे भाई श्री महावीर सिंह जी को अपना अभिभावक माना। वे भी उन्हें अपने पुत्र की तरह ही मानते थे। महावीर जी के निधन के बाद उनके दोनों पुत्रों को रामलखन जी ने भी पुत्रवत स्नेह दिया।

शाखा के शारीरिक कार्यक्रम, उत्तम गणवेश तथा साफ-सफाई के प्रति वे बहुत आग्रही थे। इसके साथ ही मधुरता, सरलता, कम खर्च, अनुशासन, समय पालन, शाखाप्रिय, अपने प्रति कठोर पर दूसरों के प्रति उदार, हिसाब-किताब में प्रामाणिकता आदि उनके स्वभाव की अन्य विशेषताएं थीं।

(संदर्भ : केशव भवन, लखनऊ से प्राप्त जानकारी)

15 जुलाई/इतिहास-स्मृति

48 वर्ष बाद अन्तिम संस्कार

जो भी व्यक्ति इस संसार में आया है, उसकी मृत्यु होती ही है। मृत्यु के बाद अपने-अपने धर्म एवं परम्परा के अनुसार उसकी अंतिम क्रिया भी होती ही है; पर मृत्यु के 48 साल बाद अपनी जन्मभूमि में किसी की अंत्येष्टि हो, यह सुनकर कुछ अजीब सा लगता है; पर हिमाचल प्रदेश के एक वीर सैनिक कर्मचंद कटोच के साथ ऐसा ही हुआ।

1962 में भारत और चीन के मध्य हुए युद्ध के समय हिमाचल प्रदेश में पालमपुर के पास अगोजर गांव का 21 वर्षीय नवयुवक कर्मचंद सेना में कार्यरत था। हिमाचल हो या उत्तरांचल या फिर पूर्वोत्तर भारत का पहाड़ी क्षेत्र, वहां के हर घर से प्रायः कोई न कोई व्यक्ति सेना में होता ही है। इसी परम्परा का पालन करते हुए 19 वर्ष की अवस्था में कर्मचंद थलसेना में भर्ती हो गया। प्रशिक्षण के बाद उसे चौथी डोगरा रेजिमेण्ट में नियुक्ति मिल गयी।

कुछ ही समय बाद धूर्त चीन ने भारत पर हमला कर दिया। हिन्दी-चीनी भाई-भाई की खुमारी में डूबे प्रधानमंत्री नेहरू के होश आक्रमण का समाचार सुनकर उड़ गये। उस समय भारतीय जवानों के पास न समुचित हथियार थे और न ही सर्दियों में पहनने लायक कपड़े और जूते। फिर भी मातृभूमि के मतवाले सैनिक सीमाओं पर जाकर चीनी सैनिकों से दो-दो हाथ करने लगे।

उस समय कर्मचंद के विवाह की बात चल रही थी। मातृभूमि के आह्नान को सुनकर उसने अपनी भाभी को कहा कि मैं तो युद्ध में जा रहा हूं। पता नहीं वापस लौटूंगा या नहीं। तुम लड़की देख लो; पर जल्दबाजी नहीं करना।

उसे डोगरा रेजिमेण्ट के साथ अरुणाचल की पहाड़ी सीमा पर भेजा गया। युद्ध के दौरान 16 नवम्बर, 1962 को कर्मचंद कहीं खो गया। काफी ढूंढ़ने पर भी न वह जीवित अवस्था में मिला और न ही उसका शव। ऐसा मान लिया गया कि या तो वह बलिदान हो गया है या चीन में युद्धबन्दी है। युद्ध समाप्ति के बाद भी काफी समय तक जब उसका कुछ पता नहीं लगा, तो उसके घर वालों ने उसे मृतक मानकर गांव में उसकी याद में एक मंदिर बना दिया।

लेकिन पांच जुलाई, 2010 को अरुणाचल की सीमा पर एक ग्लेशियर के पास सीमा सड़क संगठन के सैन्यकर्मियों को एक शव दिखाई दिया। पास जाने पर वहां सेना का बैज, 303 राइफल, 47 कारतूस, एक पेन और वेतन पुस्तिका भी मिले। साथ की चीजों के आधार पर जांच करने पर पता लगा कि वह भारत-चीन युद्ध में बलिदान हुए कर्मचंद कटोच का शव है। गांव में उसके चित्र और अन्य दस्तावेजों से इसकी पुष्टि भी हो गयी।

इस समय तक गांव में कर्मचंद की मां गायत्री देवी, पिता कश्मीर चंद कटोच और बड़े भाई जनकचंद भी मर चुके थे। उसकी बड़ी भाभी और भतीजे जसवंत सिंह को जब यह पता लगा, तो उन्होंने कर्मचंद की अंत्येष्टि गांव में करने की इच्छा व्यक्त की। सेना वालों को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। सेना ने पूरे सम्मान के साथ शहीद का शव पहले पालमपुर की होल्टा छावनी में रखा। वहां वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों ने उसे श्रद्धासुमन अर्पित किये। इसके बाद 15 जुलाई, 2010 को उस शव को अगोजर गांव में लाया गया।

तब तक यह समाचार चारों ओर फैल चुका था। अतः हजारों लोगों ने वहां आकर अपने क्षेत्र के लाड़ले सपूत के दर्शन किये। इसके बाद गांव के श्मशान घाट में कर्मचंद के भतीजे जसवंत सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी। सेना के जवानों ने गोलियां दागकर तथा हथियार उलटकर उसे सलामी दी। बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी तथा शासन-प्रशासन के लोग वहां उपस्थित हुए। इस प्रकार 48 वर्ष बाद भारत मां का वीर पुत्र अपनी जन्मभूमि में ही सदा के लिए सो गया।
(संदर्भ : दै.भास्कर, दै.जागरण 15 एवं 16.7.2010)
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15 जुलाई/पुण्य-तिथि

उत्कट स्वाभिमानी : जयदेव पाठक

संघ के वरिष्ठ जीवनव्रती प्रचारक श्री जयदेव पाठक का जन्म 1924 ई. की जन्माष्टमी वाले दिन हिण्डौन (राजस्थान) के ग्राम फाजिलाबाद में श्रीमती गुलाबोदेवी की गोद में हुआ था। उनके पिता का श्री जगनलाल शर्मा अध्यापक थे। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तो उनकी माताजी का देहांत हो गया।

हिण्डौन से कक्षा सात उत्तीर्ण कर वे जयपुर आ गये और 1942 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक किया। उन दिनों भारत छोड़ो आंदोलन का जोर था। अतः वे उसमें शामिल हो गये। इससे घर वाले बहुत नाराज हुए। इस पर जयदेव जी ने घर ही छोड़ दिया। वे इतने उत्कट स्वाभिमानी थे कि उसके बाद फिर घर गये ही नहीं।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे निकटवर्ती गांव और नगरों में प्रचार के लिए जाते थे। उस समय उन्हें न भोजन की चिन्ता रहती थी, न विश्राम की। कई बार तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही सोकर वे रात बिता देते थे। जब वह आंदोलन समाप्त हुआ, तो देशभक्ति की वह आग उन्हें संघ की ओर खींच लाई और फिर वे तन-मन से संघ के लिए समर्पित हो गये।

1942 में जयपुर में संघ का काम ‘सत्संग’ के नाम से चलता था। चार अपै्रल, 1944 को जयदेव जी ने पहली बार इसमें भाग लिया। उन दिनों श्री बच्छराज व्यास नागपुर से प्रान्त प्रचारक होकर राजस्थान आये थे। जयदेव जी उनसे बहुत प्रभावित हुए और अति उत्साह के साथ संघ शाखाओं के विस्तार में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल दिये। उनके अत्यधिक उत्साह से कई लोगों को शक हुआ कि वे खुफिया विभाग के व्यक्ति हैं; पर क्रमशः शंका के बादल छंट गये और 1946 में वे प्रचारक बन कर कार्यक्षेत्र में कूद गये।

प्रथम प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद संघ भीषण आर्थिक संकट में आ गया। ऐसे में प्रचारकों को यह कहा गया कि यदि वे चाहें, तो वापस लौटकर कोई नौकरी या काम धंधा कर सकते हैं। अतः जयदेव जी भी 1950 में अध्यापक बन गये; पर उनके मन में तो संघ बसा था। अतः सरकारी नौकरी के अतिरिक्त शेष सारा समय वे शाखा विस्तार में ही लगाते थे। बारह वर्ष तक अध्यापन करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और फिर से प्रचारक बन गये।

प्रचारक जीवन में वे उदयपुर व डूंगरपुर में जिला प्रचारक तथा उदयपुर, जयपुर, सीकर व भरतपुर में विभाग प्रचारक रहे। इस बीच दो वर्ष उन पर राजस्थान प्रान्त के बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी भी रही। खूब प्रवास करने के बावजूद वे स्वभाव से बहुत मितव्ययी थे। अपने ऊपर संगठन का एक पैसा भी अधिक खर्च न हो, इसकी ओर उनका बहुत आग्रह एवं ध्यान रहता था।

1974 से 2002 तक उन पर राजस्थान में विद्या भारती और शिक्षक संघ के संगठन मंत्री का काम रहा। 28 वर्ष के इस कालखंड में उन्होंने राजस्थान शिक्षक संघ को राज्य का सबसे बड़ा और प्रभावी संगठन बना दिया। आदर्श विद्या मंदिरों की एक बड़ी श्रृंखला के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही है। जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण प्रवास में कठिनाई होने लगी, तब भी वे राजस्थान में विद्या भारती के मार्गदर्शक के नाते संस्था की देखभाल करते रहे।

जयदेव जी के मन में एक घंटे की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी। प्रतिदिन शाखा जाने का जो व्रत उन्होंने 1944 में लिया था, उसे आजीवन निभाया। परम पवित्र भगवा ध्वज को वे ईश्वर का साकार रूप मानते थे। अतः शाखा से लौटकर ही वे अन्न-जल ग्रहण करते थे। ऐसे कर्मठ एवं स्वाभिमानी प्रचारक का 15 जुलाई, 2006 को निधन हुआ।
(संदर्भ : अभिलेखागार, भारती भवन, जयपुर)
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15 जुलाई/जन्म-दिवस

नारी उत्थान को समर्पित : दुर्गाबाई देशमुख

आंध्र प्रदेश से स्वाधीनता समर में सर्वप्रथम कूदने वाली महिला दुर्गाबाई का जन्म 15 जुलाई, 1909 को राजमुंदरी जिले के काकीनाडा नामक स्थान पर हुआ था। इनकी माता श्रीमती कृष्णवेनम्मा तथा पिता श्री रामाराव थे। पिताजी का देहांत तो जल्दी ही हो गया था; पर माता जी की कांग्रेस में सक्रियता से दुर्गाबाई के मन पर बचपन से ही देशप्रेम एवं समाजसेवा के संस्कार पड़े।

उन दिनों गांधी जी के आग्रह के कारण दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार हो रहा था। दुर्गाबाई ने पड़ोस के एक अध्यापक से हिन्दी सीखकर महिलाओं के लिए एक पाठशाला खोल दी। इसमें उनकी मां भी पढ़ने आती थीं। इससे लगभग 500 महिलाओं ने हिन्दी सीखी। इसे देखकर गांधी जी ने दुर्गाबाई को स्वर्ण पदक दिया। गांधी जी के सामने दुर्गाबाई ने विदेशी वस्त्रों की होली भी जलाई। इसके बाद वे अपनी मां के साथ खादी के प्रचार में जुट गयीं।

नमक सत्याग्रह में श्री टी.प्रकाशम के साथ सत्याग्रह कर वे एक वर्ष तक जेल में रहीं। बाहर आकर वे फिर आंदोलन में सक्रिय हो गयीं। इससे उन्हें फिर तीन वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। कारावास का उपयोग उन्होंने अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाने में किया।

दुर्गाबाई बहुत अनुशासनप्रिय थीं। 1923 में काकीनाड़ा में हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में वे स्वयंसेविका के नाते कार्यरत थी। वहां खादी वस्त्रों की प्रदर्शनी में उन्होंने नेहरू जी को भी बिना टिकट नहीं घुसने दिया। आयोजक नाराज हुए; पर अंततः उन्हें टिकट खरीदना ही पड़ा।

जेल से आकर उन्होंने बनारस मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा आंध्र विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में बी.ए किया। मद्रास वि. वि. से एम.ए की परीक्षा में उन्हें पांच पदक मिले। इसके बाद इंग्लैंड जाकर उन्होंने अर्थशास्त्र तथा कानून की पढ़ाई की। इंग्लैंड में वकालत कर उन्होंने पर्याप्त धन भी कमाया। स्वाधीनता के बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में वकालत की।

1946 में दुर्गाबाई लोकसभा और संविधान सभा की सदस्य निर्वाचित हुईं। 1953 में ही उन्होंने भारत के प्रथम वित्तमंत्री श्री चिन्तामणि देशमुख से नेहरू जी की उपस्थिति में न्यायालय में विवाह किया। इसी वर्ष नेहरू जी ने इन्हें केन्द्रीय समाज कल्याण विभाग का अध्यक्ष बनाया। इसके अन्तर्गत उन्होंने महिला एवं बाल कल्याण के अनेक उपयोगी कार्यक्रम प्रारम्भ किये। इन विषयों के अध्ययन एवं अनुभव के लिए उन्होंने इंग्लैंड, अमरीका, सोवियत रूस, चीन, जापान आदि देशों की यात्रा भी की।

दुर्गाबाई देशमुख ने आन्ध्र महिला सभा, विश्वविद्यालय महिला संघ, नारी निकेतन जैसी कई संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं के उत्थान के लिए अथक प्रयत्न किये। योजना आयोग द्वारा प्रकाशित ‘भारत में समाज सेवा का विश्वकोश’ उन्हीं के निर्देशन में तैयार हुआ। आंध्र के गांवों में शिक्षा के प्रसार हेतु उन्हें नेहरू साक्षरता पुरस्कार दिया गया। उन्होंने अनेक विद्यालय, चिकित्सालय, नर्सिंग विद्यालय तथा तकनीकी विद्यालय स्थापित किये। उन्होंने नेत्रहीनों के लिए भी विद्यालय, छात्रावास तथा तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्र खोले।

दुर्गाबाई देशमुख का जीवन देश और समाज के लिए समर्पित था। लम्बी बीमारी के बाद नौ मई, 1981 को उनका देहांत हुआ। उनके द्वारा स्थापित अनेक संस्थाएं आज भी आंध्र और तमिलनाडु में सेवा कार्यों में संलग्न हैं।
(संदर्भ : राष्ट्रधर्म दिसम्बर 2010 तथा अतंरजाल सेवा) इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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