निर्बल की पीड़ा के फिल्मकार विमल

12 जुलाई/जन्म-दिवस

निर्बल की पीड़ा के फिल्मकार विमल दा

अपनी कला के माध्यम से कलाकार किसी व्यक्ति या समाज को बदलने की क्षमता रखता है। यह उस कलाकार पर निर्भर है कि वह अपनी कला का उपयोग समाज को सही दिशा देने में करे या नीचे गिराने में।

सिनेमा इस दृष्टि से एक सशक्त माध्यम है। दुर्भाग्यवश आज सिनेमा का मुख्य उद्देश्य आधुनिकता के नाम पर केवल नंगेपन और अनुशासनहीनता का ही प्रचार-प्रसार हो गया है; पर भारत की माटी में ऐसे अनेक फिल्मकार जन्मे हैं, जिन्होंने निर्धन और निर्बल जनों की पीड़ा को उजागर किया। ऐसे ही एक अनुपम फिल्मकार थे विमल दा।

विमल दा का जन्म 12 जुलाई, 1909 को वर्त्तमान बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में कला के बीज अंकुरित होने लगे थे। बड़े होने पर उनके ध्यान में आया कि यदि कला को ही अपने जीवन का आधार बनाना है, तो इसके लिए मुम्बई सर्वश्रेष्ठ स्थान है। अतः वे ढाका से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर मुम्बई आ गये।

पर मुम्बई में जीवनयापन के लिए व्यक्ति को संघर्ष की कठिन प्रक्रिया में से गुजरना पड़ता है। विमल दा के मन में एक निर्देशक छिपा था; पर पैर जमाने के लिए उन्होंने कैमरामैन के नाते काम शुरू किया। 1935 में प्रदर्शित पी.सी. बरुआ की फिल्म ‘देवदास’ और 1937 में प्रदर्शित ‘मुक्ति’ के लिए उन्होंने फोटोग्राफी की। इनमें उनके काम की सराहना हुई।

उन दिनों धार्मिक फिल्में अच्छी सफलता प्राप्त करती थीं। रोमाण्टिक फिल्मों का दौर अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था। ऐसे में विमल दा ने एक नये क्षेत्र में हाथ डाला। वह था सामाजिक विषयों पर फिल्म बनाना। यह बहुत कठिन काम था। क्योंकि ऐसी फिल्मों में धन लगाने वाले भी आसानी से नहीं मिलते थे; पर विमल दा ने ग्रामीण क्षेत्र में जमींदारी प्रथा, बाल विवाह, विधवाओं की समस्या, जातिभेद आदि पर आधारित सामाजिक कहानियों एवं उपन्यासों से विषयों का चयन कर उन पर फिल्में बनायीं।

1944 में उन्होंने ‘उदयेर पौथे’ नामक बांग्ला फिल्म का निर्देशन किया। इसका हिन्दी रूपान्तर ‘हमराही’ नाम से हुआ और उसने अच्छी सफलता पायी। इससे विमल दा का साहस बढ़ा और उन्हें प्रसिद्धि भी मिली। 1952 में बाम्बे टाकीज के फिल्म ‘माँ’ का निर्देशन किया; पर अभी उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ काम बाकी था। फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ से उन्हें वास्तविक सफलता मिली।

यह एक ऐसे किसान की कहानी है, जो गाँव में जमींदार के पास बन्धक रखी अपनी दो बीघा जमीन को छुड़ाने के लिए शहर में रिक्शा खींचता है। इस फिल्म ने विमल दा को अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलायी। उन्हें कान और कार्लोवी वैरी फिल्म समारोहों में सम्मानित किया गया। शरदचन्द्र के उपन्यास पर उन्होंने ‘बिराज बहू’ और ‘देवदास’ फिल्में बनायीं। 1958 में पुनर्जन्म पर आधारित ‘मधुमती’ और ‘यहूदी’ फिल्मों का निर्देशन किया।

विमल दा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘बन्दिनी’ थी। इसमें हत्या के आरोप में जेल में बन्द एक महिला के अन्तर्मन की दशा का सजीव चित्रण है। फिर उन्होंने छुआछूत पर आधारित ‘सुजाता’ फिल्म बनाई। इससे सामाजिक समस्याओं को फिल्मों में केन्द्रीय स्थान मिलने लगा। विमल दा को सात बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 7 जनवरी, 1966 को लम्बी बीमारी के बाद भारतीय सिनेमा का यह रत्न सदा के लिए शान्त हो गया।
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12 जुलाई/पुण्य-तिथि

संघव्रती जुगल किशोर परमार

मध्यभारत प्रांत की प्रथम पीढ़ी के प्रचारकों में से एक श्री जुगलकिशोर परमार का जन्म इंदौर के एक सामान्य परिवार में 1919 में हुआ था। भाई-बहिनों में सबसे बड़े होने के कारण घर वालों को उनसे कुछ अधिक ही अपेक्षाएं थीं; पर उन्होंने संघव्रत अपनाकर आजीवन उसका पालन किया।

जुगल जी किशोरावस्था में संघ के सम्पर्क में आकर शाखा जाने लगे। उन्होंने इंदौर के होल्कर महाविद्यालय से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे ट्यूशन करते हुए अपनी पढ़ाई करते थे। संघ कार्य की लगन के कारण 1940 में वे पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम उन्हें मंदसौर भेजा गया। उन दिनों संघ के पास पैसे का अभाव रहता था। अतः वे ट्यूशन करते हुए संघ कार्य करते रहे।

मंदसौर के बाद वे उज्जैन, देवास की हाट, पिपल्या व बागली तहसीलों में प्रचारक रहे। इसके बाद मध्यभारत प्रांत का पश्चिम निमाड़ ही मुख्यतः उनका कार्यक्षेत्र बना रहा। बड़वानी को अपना केन्द्र बनाकर उन्होंने पूरे खरगौन जिले के दूरस्थ गांवों में संघ कार्य को फैलाया। उनके कार्यकाल में पहली बार उस जिले में 100 से अधिक शाखाएं हो गयीं।

1950 में संघ पर से प्रतिबन्ध हटने के बाद बड़ी विषम स्थिति थी। बड़ी संख्या में लोग संघ से विमुख हो गये थे। संघ कार्यालयों का सामान पुलिस ने जब्त कर लिया था। न कहीं ठहरने का ठिकाना था और न भोजन का। ऐसे में अपनी कलाई घड़ी बेच कर उन्होंने कार्यालय का किराया चुकाया।

संघ के पास पैसा न होने से प्रवास करना भी कठिन होता था; पर जुगल जी ने हिम्मत नहीं हारी। वे पूरे जिले में पैदल प्रवास करने लगे। प्रतिबन्ध काल में उन्होंने कुछ कर्ज लिया था। उसे चुकाने तक उन्होंने नंगे पैर ही प्रवास किया; लेकिन ऐसी सब कठिनाइयों के बीच भी उनका चेहरा सदा प्रफुल्लित ही रहता था।

जुगल जी का स्वभाव बहुत मिलनसार था; पर इसके साथ ही वे बहुत अनुशासनप्रिय तथा कर्म-कठोर भी थे। वे सबको साथ लेकर चलने तथा स्वयं नेपथ्य में रहकर काम करना पसंद करते थे। काम पूर्ण होने पर उसका श्रेय सहयोगी कार्यकर्ताओं को देने की प्रवृत्ति के कारण शीघ्र ही उनके आसपास नये और समर्थ कार्यकर्ताओं की टोली खड़ी हो जाती थी। कुछ समय तक विदिशा जिला प्रचारक और फिर 1974 तक वे इंदौर के विभाग प्रचारक रहे।

मध्य भारत में विश्व हिन्दू परिषद का काम शुरू होने पर उन्हें प्रांत संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। इसे उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया। आपातकाल में वे भूमिगत हो गये; पर फिर पकड़े जाने से उन्हें 16 महीने कारावास में रहना पड़ा। जेल में भी वे अनेक धार्मिक आयोजन करते रहते थे। इससे कई खूंखार अपराधी तथा जेल के अधिकारी भी उनका सम्मान करने लगे।

जुगल जी स्वदेशी के प्रबल पक्षधर थे। वे सदा खादी या हथकरघे के बने वस्त्र ही पहनते थे। धोती-कुर्ता तथा कंधे पर लटकता झोला ही उनकी पहचान थी। प्रवास में किसी कार्यकर्ता के घर नहाते या कपड़े धोते समय यदि विदेशी कंपनी का साबुन उन्हें दिया जाता, तो वे उसे प्रयोग नहीं करते थे।

ऐसे कर्मठ कार्यकर्ता का देहांत भी संघ कार्य करते हुए ही हुआ। 12 जुलाई, 1979 को वे भोपाल में प्रातःकालीन चौक शाखा में जाने के लिए निकर पहन कर निकले। मार्ग में आजाद बाजार के पास सड़क पर उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ और तत्काल ही उनका प्राणांत हो गया।

कहते हैं कि अंतिम यात्रा पर हर व्यक्ति अकेला ही जाता है; पर यह भी विधि का विधान ही था कि जीवन भर लोगों से घिरे रहने वाले जुगल जी उस समय सचमुच अकेले ही थे।
(संदर्भ : मध्यभारत की संघगाथा)
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12 जुलाई/जन्म-दिवस

नींव और आधार स्तम्भ : दयाचंद जैन

देहरादून उत्तराखंड राज्य की राजधानी है। यहां संघ के काम में नींव और फिर आधार स्तम्भ के रूप में प्रमुख भूमिका निभाने वाले श्री दयाचंद जी का जन्म 12 जुलाई, 1928 को ग्राम तेमला गढ़ी (जिला बागपत, उ.प्र.) में श्रीमती अशर्फी देवी तथा श्री धर्मदास जैन के घर में हुआ था। निकटवर्ती कस्बे दाहा से मिडिल तक की शिक्षा पाकर वे आगे पढ़ाई और कारोबार के लिए देहरादून आ गये। 1942 में यहां पर ही वे स्वयंसेवक बने।

1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय सत्याग्रह कर वे तीन माह आगरा जेल में रहे। प्रतिबंध के बाद देहरादून में संघ के प्रायः सभी बड़े कार्यकर्ता काम से पीछे हट गये। ऐसे में दयाचंद जी ने नये सिरे से काम प्रारम्भ किया। 1960 में वे संघ के तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण के लिए नागपुर गये। विद्यालयी शिक्षा कम होते हुए भी उन्होंने वहां बौद्धिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

देश, धर्म और समाज पर आने वाले हर चुनौती में वे अग्रणी भूमिका में रहते थे। 1967 में गोरक्षा आंदोलन में वे दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे। 1975 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर वे प्रारम्भ में भूमिगत हो गये और फिर 15 अगस्त को सत्याग्रह कर छह माह के लिए जेल में रहे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय भी वे हर आंदोलन में वे सदा आगे रहे।

दयाचंद जी बहुत दिलेर प्रकृति के व्यक्ति थे। इंदिरा गांधी की हत्या होने पर जब कांग्रेस वाले बाजार बंद कराने निकले, तो दयाचंद जी ने दुकान बंद नहीं की। उन्होंने कहा कि जिसने आपातकाल में पूरे देश को जेल बना दिया था, जिसके कारण मेरी दुकान साल भर बंद रही, उसकी मृत्यु पर मैं दुकान बंद नहीं करूंगा। कांग्रेसी लोग अपना सा मुंह लेकर चुपचाप आगे चले गये।

दयाचंद जी ने मुख्यशिक्षक से लेकर जिला कार्यवाह, जिला संघचालक और प्रान्त व्यवस्था प्रमुख जैसी जिम्मेदारियां निभाईं। वे किसी सूचना की प्रतीक्षा किये बिना स्वयं योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करते थे। निर्धन कार्यकर्ताओं की बेटियों के सम्मानपूर्वक विवाह की वे विशेष चिन्ता करते थे।

सामाजिक जीवन में उनका स्थान इतना महत्वपूर्ण था कि झंडा बाजार में उनकी कपड़े की दुकान पर समाज के सब तरह के लोग उनसे परामर्श करने आते थे। कई लोग तो हंसी में कहते थे कि ‘झंडे वाले बाबा’ के पास हर समस्या का समाधान है।

देहराूदन में जब सरस्वती शिशु मंदिर खुला, तो मोती बाजार स्थित संघ कार्यालय में ही उसकी कक्षाएं प्रारम्भ कर दी गयीं। कुछ समय बाद जब तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्री भाऊराव देवरस वहां आये, तो उन्होंने शिशु मंदिर को वहां से स्थानांतरित करने को कहा। दयाचंद जी ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और एक स्थान खोजकर नये सत्र में विद्यालय वहां पहुंचा दिया।

शिक्षा के महत्व को समझते हुए सरस्वती शिशु मंदिरों के प्रसार का उन्होंने विशेष प्रयास किया। देहरादून में संघ परिवार की हर संस्था से वे किसी न किसी रूप से जुड़े थे। उनकी सोच सदा सार्थक दिशा में रहती थी। अंतिम दिनों में वे जब चिकित्सालय में भर्ती थे, तो उनसे मिलने आये कुछ कार्यकर्ता किसी की आलोचना कर रहे थे। दयाचंद जी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अच्छा सोचो और अच्छा बोलो, तो परिणाम भी अच्छा ही निकलेगा।

70 वर्ष तक सक्रिय रहे ऐसे श्रेष्ठ कार्यकर्ता का देहांत 24 मार्च, 2012 को हुआ।
(संदर्भ : राष्ट्रदेव, देहरादून, 30.4.2012)
इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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