शौर्यपूर्ण व्यक्तित्व राव हमीर भारत के इतिहास में राव हमीर को वीरता के साथ ही उनकी हठ के लिए भी याद किया जाता है उनकी हठ के बारे में कहावत प्रसिद्ध है

7 जुलाई/जन्म-दिवस

शौर्यपूर्ण व्यक्तित्व राव हमीर

भारत के इतिहास में राव हमीर को वीरता के साथ ही उनकी हठ के लिए भी याद किया जाता है। उनकी हठ के बारे में कहावत प्रसिद्ध है –

सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार
तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।।

अर्थात सिंह एक ही बार संतान को जन्म देता है। सच्चे लोग बात को एक ही बार कहते हैं। केला एक ही बार फलता है। स्त्री को एक ही बार तेल एवं उबटन लगाया जाता है अर्थात उसका विवाह एक ही बार होता है। ऐसे ही राव हमीर की हठ है। वह जो ठानते हैं, उस पर दुबारा विचार नहीं करते।

राव हमीर का जन्म सात जुलाई, 1272 को चौहानवंशी राव जैत्रसिंह के तीसरे पुत्र के रूप में अरावली पर्वतमालाओं के मध्य बने रणथम्भौर दुर्ग में हुआ था। बालक हमीर इतना वीर था कि तलवार के एक ही वार से मदमस्त हाथी का सिर काट देता था। उसके मुक्के के प्रहार से बिलबिला कर ऊंट धरती पर लेट जाता था। इस वीरता से प्रभावित होकर राजा जैत्रसिंह ने अपने जीवनकाल में ही 16 दिसम्बर, 1282 को उनका राज्याभिषेक कर दिया।

राव हमीर ने अपने शौर्य एवं पराक्रम से चौहान वंश की रणथम्भौर तक सिमटी सीमाओं को कोटा, बूंदी, मालवा तथा ढूंढाढ तक विस्तृत किया। हमीर ने अपने जीवन में 17 युद्ध किये, जिसमें से 16 में उन्हें सफलता मिली। 17 वां युद्ध उनके विजय अभियान का अंग नहीं था।

उन्होंने अपनी हठ के कारण दिल्ली के तत्कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी के एक भगोड़े सैनिक मुहम्मदशाह को शरण दे दी। हमीर के शुभचिंतकों ने बहुत समझाया; पर उन्होंने किसी की नहीं सुनी। उन्हें रणथम्भौर दुर्ग की अभेद्यता पर भी विश्वास था, जिससे टकराकर जलालुद्दीन खिलजी जैसे कई लुटेरे वापस लौट चुके थे।

कुछ वर्ष बाद जलालुद्दीन की हत्याकर दिल्ली की गद्दी पर उसका भतीजा अलाउद्दीन खिलजी बैठ गया। वह अति समृद्ध गुजरात पर हमला करना चाहता था; पर रणथम्भौर उसके मार्ग की बाधा बना था। अतः उसने पहले इसे ही जीतने की ठानी; पर हमीर की सुदृढ़ एवं अनुशासित वीर सेना ने उसे कड़ी टक्कर दी।

11 मास तक रणथम्भौर से सिर टकराने के बाद सेनापतियों ने उसे लौट चलने की सलाह दी; पर अलाउद्दीन ने कपट नीति अपनाकर किले के रसद वाले मार्ग को रोक लिया तथा कुछ रक्षकों को भी खरीद लिया; लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उसे पराजित होना पड़ा।

कहते हैं कि जब हमीर की सेनाओं ने अलाउद्दीन को हरा दिया, तो हिन्दू सैनिक उत्साह में आकर शत्रुओं से छीने गये झंडों को ही ऊंचाकर किले की ओर बढ़ने लगे। इससे दुर्ग की महिलाओं ने समझा कि शत्रु जीत गया है। अतः उन्होंने जौहर कर लिया। राव हमीर जब दुर्ग में पहुंचे, तो यह दृश्य देखकर उन्हें राज्य और जीवन से वितृष्णा हो गयी। उन्होंने अपनी ही तलवार से सिर काटकर अपने आराध्य भगवान शिव को अर्पित कर दिया। इस प्रकार केवल 29 वर्ष की अल्पायु में 11 जुलाई, 1301 को हमीर का शरीरांत हुआ।

राव हमीर पराक्रमी होने के साथ ही विद्वान, कलाप्रेमी, वास्तुविद एवं प्रजारक्षक राजा थे। प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य महर्षि शारंगधर की ‘शारंगधर संहिता’ में हमीर द्वारा रचित श्लोक मिलते हैं। रणथम्भौर के खंडहरों में विद्यमान बाजार, व्यवस्थित नगर, महल, छतरियां आदि इस बात के गवाह हैं कि उनके राज्य में प्रजा सुख से रहती थी। यदि एक मुसलमान विद्रोही को शरण देने की हठ वे न ठानते, तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता। वीर सावरकर ने हिन्दू राजाओं के इन गुणों को ही ‘सद्गुण विकृति’ कहा है। (संदर्भ : राष्ट्रधर्म, जुलाई 2010)
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7 जुलाई/जन्म-दिवस

मानवता के हमदर्द गुरु हरिकिशन जी

सिख पन्थ के इतिहास में आठवें गुरु हरिकिशन जी का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। सात जुलाई, 1657 को जन्मे गुरु हरिकिशन जी को बहुत छोटी अवस्था में गुरु गद्दी प्राप्त हुई तथा छोटी आयु में ही बीमारी के कारण उन्होंने देह त्याग दी; पर इस अल्प जीवन में भी उन्होंने वह काम किया, जिसके कारण उन्हें मानवता का हमदर्द माना जाता है। प्रतिदिन गुरुद्वारों में प्रार्थना के समय उनकी चर्चा करते हुए कहा जाता है – श्री हरिकिशन धियाइये, जिन डिट्ठे सब दुख जाये।

ऐसा कहते हैं कि सातवें गुरु हरिराय जी को सदा यह चिन्ता लगी रहती थी कि उनके बाद गुरु गद्दी कौन सँभालेगा। एक बार उन्होंने परीक्षा लेने के लिए एक भक्त को कहा कि नाम स्मरण के समय बड़े पुत्र रामराय तथा छोटे पुत्र हरिकिशन को सुई चुभा कर देखे। भक्त ने दोनों को सुई चुभाई, तो रामराय आपे से बाहर हो गये; पर हरिकिशन जी को उसका पता ही नहीं लगा। तब से गुरु हरिराय जी ने उन्हें गद्दी सौंपने का मन बना लिया। रामराय ने मुगल बादशाह औरंगजेब से सम्मान पाने के लिए गुरुवाणी के शब्द में बदल भी की थी। इससे समस्त सिख जगत उनसे नाराज था।

गुरु हरिकिशन जी बचपन से ही प्रतापी, उदारचित्त एवं सन्त स्वभाव के थे। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा बालगुरु हुआ हो, जिसने मानवता की भलाई के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर दिया हो। हरिकिशन जी के काल में एक बार दिल्ली में महामारी फैल गयी। दूर-दूर तक हैजे और चेचक से पीड़ित लोग ही नजर आते थे। ऐसे में हरिकिशन जी ने सबको ‘वाहे गुरु’ नाम जपने का सन्देश दिया।
उन्होंने निर्धन तथा रोग पीड़ित लोगों के लिए लंगर की व्यवस्था कराई तथा तन, मन और धन से उनकी सेवा की। इस सेवा कार्य में उन्होंने हिन्दू या मुसलमान का भेद नहीं किया। इस कारण हिन्दू इनको बाला प्रीतम या बाला गुरु तथा मुसलमान बाला पीर कहते थे।

सेवा के बारे मे गुरु हरिकिशन जी ने कहा है – सेवा करते होवे सिंह कामी, तिसको प्रापत होवे स्वामी।।

इस सेवा कार्य में व्यस्त रहने के कारण उन्हें स्वयं रोगों ने घेर लिया। इसके बाद भी वे अपने से अधिक चिन्ता दूसरों की ही करते रहे। जब उनका रोग बहुत बढ़ गया, तो उन्हें अनुमान हो गया कि अब यह शरीर जाने वाला है। उन्होंने समस्त संगत तथा अपनी माता को दुखी देखकर कहा –
अब हम पुरधाम को जावै, तन तजि जोत समावै।।

अब समस्या आयी कि उनके बाद गुरु गद्दी का वारिस कौन होगा ? तब तक सिख पन्थ का प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि अनेक लोग इस सर्वोच्च स्थान को पाने के इच्छुक थे। जब संगत ने गुरु हरिकिशन जी इस बारे में कुछ पूछा, तो उनके मुख से निकला – बाबा बकाला। यह बात फैलते ही बकाला गाँव में कई लोग धर्मात्मा का स्वांग कर बैठ गये; पर अन्ततः श्री तेगबहादुर जी को यह स्थान प्राप्त हुआ।

मानवता के सच्चे सेवक गुरु हरिकिशन जी की ज्योति 30 मार्च, 1664 को उस परम ज्योति में समा गयी। उन्होंने संसार को दिखा दिया कि सेवा कार्य या आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में उम्र कोई बाधा नहीं है। यदि किसी पर ईश्वर और गुरु की कृपा हो, तो वह अल्पावस्था में ही उच्च पद पा सकता है।
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7 जुलाई/जन्म-दिवस

अमर कहानीकार चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’

हिन्दी साहित्य में बहुत कम रचनाओं के बावजूद जो साहित्यकार अमर हुए हैं, उनमें से एक श्री चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ का जन्म 7 जुलाई, 1883 को संस्कृत कॉलिज, जयपुर के प्राचार्य महोपाध्याय पण्डित शिवराम शास्त्री के घर में हुआ था। इनके पूर्वज हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित गुलेर गाँव के मूल निवासी थे। इसी से यह वंश ‘गुलेरी’ कहलाया।

शास्त्री जी प्राचार्य के साथ-साथ जयपुर राजदरबार के धार्मिक परामर्शदाता भी थे। उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मीदेवी भी विदुषी तथा धर्मपरायण महिला थीं। इसका प्रभाव इन पर भी पड़ा। छह वर्ष की अवस्था में ही इन्होंने अमरकोष के सौ से अधिक श्लोक तथा अष्टाध्यायी के दो अध्याय कण्ठस्थ कर लिये थे।

11 वर्ष की अवस्था में इन्होंने पण्डित दीनदयाल शर्मा एवं महामना मदनमोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित ‘भारत धर्म महामण्डल’ के वार्षिकोत्सव में सबको अपने धाराप्रवाह संस्कृत भाषण से सम्मोहित कर लिया था।

1897 से इनकी विद्यालयीन शिक्षा प्रारम्भ हुई। छात्र जीवन में प्रायः सभी परीक्षाएँ इन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। इससे इन्हें अनेक पुरस्कार, छात्रवृत्तियाँ तथा सम्मान मिले। इनका हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। इसके अतिरिक्त ये अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं के भी जानकार थे। 1900 ई. में इन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के सहयोग से जयपुर में ‘नागरी भवन’ की स्थापना कर उसके पुस्तकालय को दुर्लभ ग्रन्थों एवं पाण्डुलिपियों से समृद्ध किया।

1902 में शासन ने जयपुर के मान मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया, तो अंग्रेज अभियन्ताओं के साथ इन्हें भी परामर्शदाता बनाया गया। फिर इन्होंने कैप्टन गैरट के साथ ‘जयपुर आब्जरवेटरी बिल्डर्स’ नामक विशाल ग्रन्थ का निर्माण तथा ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सम्राट सिद्धान्त’ का अंग्रेजी अनुवाद किया। 1904 में वे मेयो कॉलेज, अजमेर में संस्कृत के अध्यापक बने।

वे हिन्दी तथा संस्कृत की अनेक सभा, समितियों के सदस्य तथा अध्यक्ष रहे। भाषा-शास्त्रियों में उनकी अच्छी ख्याति थी। उनकी प्रतिभा देखकर 1920 में शारदा पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य ने उन्हें ‘इतिहास दिवाकर’ की उपाधि से विभूषित किया था। इसी वर्ष मालवीय जी के अनुरोध पर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राच्य विभाग के प्राचार्य का पदभार सँभाला।

गुलेरी जी ने 1900 से 1922 तक प्रचुर साहित्य रचा; जो तत्कालीन पत्रों में प्रकाशित भी हुआ; पर वह सब एक स्थान पर संकलित न होने के कारण उनका सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। ऐसी मान्यता है कि उन्होंने केवल तीन कहानियाँ लिखीं; पर उन्हें अमर बनाने का श्रेय उनकी एक कहानी ‘उसने कहा था’ को है, जिसमें प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में किशोर अवस्था के प्रेम का बहुत मार्मिक वर्णन है।

गुलेरी जी अपने गाँव वर्ष में एक-दो बार ही आते थे; पर उनके साहित्य में पहाड़ी शब्दों, कहावतों, परम्पराओं, नदी, पर्वतों आदि की भरपूर चर्चा है। यह उनके प्रकृति के प्रति अतिशय प्रेम का परिचायक है।

27 अगस्त, 1922 को उनकी भाभी का काशी में देहान्त हुआ। उस समय उन्हें तेज बुखार था। शवदाह के बाद एक साथी के दुराग्रह पर उन्होंने भी गंगा जी में स्नान कर लिया। इससे उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और सन्निपात की अवस्था में केवल 39 वर्ष की अल्पायु में 12 सितम्बर, 1922 को वे चल बसे।
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7 जुलाई/जन्म-दिवस

पखावज के साधक पुरुषोत्तम दास जी

भारतीय शास्त्रीय संगीत अपने प्रारम्भिक चरण में देवालयों में विकसित हुआ। सन्तों ने भजन, कीर्तन व संगीत के माध्यम से ही ईश्वर की आराधना की। राजस्थान का श्रीनाथद्वारा भी ऐसा ही एक मंदिर है, जहाँ पखावज वादन की एक समृद्ध परम्परा विकसित हुई। इस परम्परा में यों तो अनेक प्रसिद्ध साधक हुए हैं; जिनमें श्री पुरुषोत्तम दास जी का नाम विशेष उल्लेखनीय है।

बीसवीं शती के इस महान कला साधक का जन्म श्रीनाथद्वारा में सात जुलाई, 1907 को हुआ था। उनके पिता पण्डित घनश्यामदास पखावजी स्वयं बड़े कलाकार थे। इस कारण पुरुषोत्तमदास जी को यह परम्परा विरासत में मिली। पाँच साल की अवस्था से ही वे अपने पिता की देखादेखी पखावज पर हाथ चलाने लगे; पर जब वे केवल नौ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया।

ऐसे में गोस्वामी गोवर्धनलाल जी ने उनके भोजन, आवास आदि की व्यवस्था मन्दिर की ओर से कराई, जिससे वे साधना कर सकें। उन्होंने न केवल अपने पिता द्वारा प्राप्त ज्ञान को साधा, अपितु अनेक नयी रचनाएँ भी बनायीं। इसमें उनके गुरु की भूमिका ‘मदृंग सागर’ नामक ग्रन्थ ने निभाई। एकलव्य की तरह उन्होंने इसकी सहायता से पखावज वादन में महारत प्राप्त की।

पर यह सब इतना सरल नहीं था। दिन में वे केशव भवन की धर्मशाला में चौकीदारी करते और रात को दस बजे के बाद नायक गोविन्दराम और अन्य कुछ मित्रों के साथ बस्ती के पास स्थित दयाराम समाधानी की बाड़ी में जाकर साधना करते। गोविन्दराम गाते और पुरुषोत्तमदास पखावज बजाते। उनकी साधना देखकर 1932 में उन्हें उनके पिता और गुरु की गद्दी सौंप दी गयी। इससे उनकी रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या हल हो गयी।

1953 में पुरुषोत्तम दास जी ने आकाशवाणी से कार्यक्रम देना प्रारम्भ किया। इससे इनकी कला की जानकारी पूरे देश को हुई। अब उन्हें राजस्थान के अलावा देश भर से संगीत समारोहों के निमन्त्रण मिलने लगे; पर वे कार्यक्रम के बाद फिर श्रीनाथद्वारा लौट आते। वस्तुतः उनका मन श्रीनाथ जी चरणों में ही लगता था। इस दौरान उनकी घनिष्ठता देश के अनेक बड़े कलाकारों से हुई। डागर बन्धुओं ने उनसे कई बार आग्रह किया कि वे दिल्ली में रहें। इससे उनकी कला का लाभ पूरे विश्व को मिलेगा।

1956 में पुरुषोत्तम दास जी दिल्ली आ गये। यहाँ सर्वप्रथम वे ‘भारतीय कला केन्द्र’ से जुड़े। इसके बाद 1964 में ‘केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी’ द्वारा संचालित ‘कथक केन्द्र’ में उन्हें वरिष्ठ गुरु का स्थान दिया गया। इस दौरान उन्होंने नेपाल, पाकिस्तान, जापान, रूस, श्रीलंका आदि अनेक देशों की संगीत यात्रा की। दिल्ली में उन्होंने देशी-विदेशी अनेक साधकों को पखावज की शिक्षा भी दी। उन्होंने ‘मदृंग वादन’ नामक एक पुस्तक भी लिखी, जिसे केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से प्रकाशित किया गया।

पद्मश्री सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत पुरुषोत्तम दास जी ने 1982 में कथक केन्द्र से अवकाश लेकर सीधे श्रीनाथद्वारा की राह पकड़ी। यहाँ आकर उन्होंने श्रीनाथ संगीत शिक्षण केन्द्र मन्दिर में प्राचार्य का पद ग्रहण किया। इस पर कार्य करते हुए ही 21 जनवरी, 1991 को पखावज का यह साधक सदा के लिए श्रीनाथ जी के चरणों में लीन हो गया।
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7 जुलाई/जन्म-दिवस

विलक्षण संन्यासी करपात्री जी महाराज

स्वामी करपात्री जी के नाम से प्रसिद्ध संन्यासी का बचपन का नाम हरनारायण था। इनका जन्म सात जुलाई, 1907 ग्राम भटनी, उत्तर प्रदेश में पण्डित रामनिधि तथा श्रीमती शिवरानी के घर में हुआ था। सनातन धर्म के अनुयायी इनके पिता श्रीराम एवं भगवान शंकर के परमभक्त थे। वे प्रतिदिन पार्थिव पूजा एवं रुद्राभिषेक करते थे। यही संस्कार बालक हरनारायण पर भी पड़े।

बाल्यावस्था में इन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन किया। एक बार इनके पिता इन्हें एक ज्योतिषी के पास ले गये और पूछा कि ये बड़ा होकर क्या बनेगा ? ज्योतिषी से पहले ही ये बोल पड़े, मैं तो बाबा बनूँगा। वास्तव में बचपन से ही इनमें विरक्ति के लक्षण नजर आने लगे थे। समाज में व्याप्त अनास्था एवं धार्मिक मर्यादा के उल्लंघन को देखकर इन्हें बहुत कष्ट होता था। ये कई बार घर से चले गये; पर पिता जी इन्हें फिर ले आते थे।

जब ये कुछ बड़े हुए, तो इनके पिता ने इनका विवाह कर दिया। उनका विचार था कि इससे इनके पैरों में बेड़ियाँ पड़ जायेंगी; पर इनकी रुचि इस ओर नहीं थी। इनके पिता ने कहा कि एक सन्तान हो जाये, तब तुम घर छोड़ देना। कुछ समय बाद इनके घर में एक पुत्री ने जन्म लिया। अब इन्होंने संन्यास का मन बना लिया। इनकी पत्नी भी इनके मार्ग की बाधक नहीं बनी। इस प्रकार 19 वर्ष की अवस्था में इन्होंने घर छोड़ दिया।

गृहत्याग कर उन्होंने अपने गुरु से वेदान्त की शिक्षा ली और फिर हिमालय के हिमाच्छादित पहाड़ों पर चले गये। वहाँ घोर तप करने के बाद इन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद इन्होंने अपना शेष जीवन देश, धर्म और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया। ये शरीर पर कौपीन मात्र पहनते थे। भिक्षा के समय जो हाथ में आ जाये, वही स्वीकार कर उसमें ही सन्तोष करते थे। इससे ये ‘करपात्री महाराज’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

1930 में मेरठ में इनकी भेंट स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी से हुई। वैचारिक समानता होने के कारण इसके बाद ये दोनों सन्त ‘एक प्राण दो देह’ के समान आजीवन कार्य करते रहे। करपात्री जी महाराज का मत था कि संन्यासियों को समाज को दिशा देने के लिए सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना चाहिए। अतः इन्होंने रामराज्य परिषद, धर्मवीर दल, धर्मसंघ, महिला संघ.. आदि संस्थाएँ स्थापित कीं।

धर्मसंघ महाविद्यालय में छात्रों को प्राचीन एवं परम्परागत परिपाटी से वेद, व्याकरण, ज्योतिष, न्याय शास्त्र व कर्मकाण्ड की शिक्षा दी जाती थी। सिद्धान्त, धर्म चर्चा, सनातन धर्म विजय जैसी पत्रिकाएँ तथा दिल्ली, काशी व कोलकाता से सन्मार्ग दैनिक उनकी प्रेरणा से प्रारम्भ हुए।

1947 से पूर्व स्वामी जी अंग्रेज शासन के विरोधी थे; तो आजादी के बाद कांग्रेस सरकार की हिन्दू धर्म विरोधी नीतियों का भी उन्होंने सदा विरोध किया। उनके विरोध के कारण शासन को ‘हिन्दू कोड बिल’ टुकड़ों में बाँटकर पारित करना पड़ा। गोरक्षा के लिए सात नवम्बर, 1966 को दिल्ली में हुए विराट् प्रदर्शन में स्वामी जी ने भी लाठियाँ खाईं और जेल गये।

स्वामी जी ने शंकर सिद्धान्त समाधान; मार्क्सवाद और रामराज्य; विचार पीयूष; संघर्ष और शान्ति; ईश्वर साध्य और साधन; वेदार्थ पारिजात भाष्य; रामायण मीमाँसा; पूंजीवाद, समाजवाद और रामराज्य आदि ग्रन्थों की रचना की।

महान गोभक्त, विद्वान, धर्मरक्षक एवं शास्त्रार्थ महारथी स्वामी करपात्री जी का निधन सात फरवरी, 1982 को हुआ।

7 जुलाई/जन्म-दिवस

सरल व सहज चन्द्रिका प्रसाद जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम मनुष्यों को जोड़कर, उनकी क्षमता का उपयोग देश, धर्म और समाज के काम में करना है। इस काम में तरह-तरह के स्वभाव और प्रवृत्ति के लोग जुड़ते हैं। सबकी पारिवारिक, शैक्षिक और वैचारिक पृष्ठभूमि भी अलग-अलग होती है। यद्यपि संघ के कार्यक्रमों की रगड़ाई और अनुशासन के कारण व्यक्ति अपने आप को काफी बदलता है, फिर भी उनके स्वभाव की विविधताएं प्रकट होती ही रहती हैं। चंद्रिका प्रसाद जी भी एक ऐसे ही प्रचारक थे। उनके स्वभाव की सरलता, सादगी और सहजता उनके आचरण और व्यवहार से जीवन भर परिलक्षित होती रही।

चंद्रिका प्रसाद जी का जन्म सात जुलाई, 1947 को उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले के एक गांव अखईपुर में हुआ था। श्री खरभान प्रजापति उनके पिताजी एवं श्रीमती नागेश्वरी देवी माताजी थीं। कुछ समय बाद उनका परिवार वहां से 20 कि.मी. दूर ग्राम हनुआडीह में बस गया। चार भाई-बहिन वाले घर में चंद्रिका जी दूसरे नंबर पर थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मुफ्तीगंज में हुई। इसके बाद उन्होंने राज काॅलेज, जौनपुर से इंटर तथा कर्रा काॅलिज, डोभी से बी.एस-सी. की उपाधि प्राप्त की।

भारत के कई भागों में छोटी आयु में ही विवाह हो जाते हैं। चंद्रिका जी का विवाह भी छात्र जीवन में ही श्रीमती मालती देवी से हुआ। बी.एस-सी. में पढ़ते समय वे तत्कालीन प्रचारक ठाकुर राजनीति सिंह के सम्पर्क में आकर स्वयंसेवक बने। धीरे-धीरे संघ का विचार उनके मन में गहराई से बैठ गया और उन्होंने प्रचारक बनने का संकल्प ले लिया। श्री राजनीति सिंह स्वयं भी गृहस्थ प्रचारक थे। उन्होंने चंद्रिका जी का उत्साह बढ़ाया। इस प्रकार घर और संघ कार्य में संतुलन रखते हुए चंद्रिका जी प्रचारक बन गये।

चंद्रिका प्रसाद जी के प्रचारक जीवन की यात्रा 1972 में बस्ती जिले में बांसगांव के तहसील प्रचारक के नाते प्रारम्भ हुई। इसके बाद वे गोरखपुर और बस्ती में जिला प्रचारक, गोरखपुर में सहविभाग प्रचारक तथा फिर फतेहपुर में विभाग प्रचारक रहे। आपातकाल में वे पुलिस को छकाते हुए भूमिगत रहकर ही काम करते रहे। सर्वाधिक लम्बा समय उन्होंने साकेत में बिताया, जहां वे दस वर्ष तक विभाग प्रचारक रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश को संघ कार्य के लिए पहले दो और फिर चार प्रांतों में बांटा गया। चंद्रिका जी पर कई वर्ष तक अवध प्रांत के सम्पर्क प्रमुख की जिम्मेदारी रही। इस नाते उन्होंने पूरे प्रांत का प्रवास किया।

लखनऊ में ‘विश्व संवाद केन्द्र’ से मीडिया सम्बन्धी गतिविधियां चलती हैं। उसकी देखरेख के लिए एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की आवश्यकता अनुभव हो रही थी। अतः चंद्रिका प्रसाद जी को उसकी जिम्मेदारी दे दी गयी; पर वहां रहते हुए उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और 2005 में उन्हें मस्तिष्काघात (बे्रन हेमरेज) हुआ। यद्यपि समय पर चिकित्सा होने से वे काफी ठीक हो गये; पर पहले जैसी स्थिति नहीं हो सकी। उनकी स्मृति और आवाज पर इसका दुष्प्रभाव हुआ। अतः सक्रिय कार्य से मुक्त होकर वे लखनऊ में ‘भारती भवन’ कार्यालय पर रहने लगे। वहां पर उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उसकी पूर्ण चिकित्सा के लिए उन्हें काशी हिन्दू वि.वि. के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान वहां पर ही पांच अगस्त 2014 को हुए दूसरे हृदयाघात से उनका निधन हुआ।

चंद्रिका जी स्वभाव से बहुत सरल, सहज तथा विनम्र व्यक्ति थे। वे सदा खुश रहते थे तथा आसपास वालों को भी खुश रखते थे। वे किसी काम को छोटा नहीं समझते थे। गंदगी देखकर वे निःसंकोच झाड़ू उठा लेते थे। मितव्ययी होने के कारण उनके निजी खर्चे भी बहुत कम थे। वे जहां भी रहे, वहां के कार्यकर्ता उनकी सरलता तथा सादगी को आज भी याद करते हैं।

(संदर्भ : पुत्र अखिलेश प्रजापति से प्राप्त जानकारी इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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