रमजान रहमत व बकसीस का महिना‌ है मौलाना‌‌ वसी अहमद गौसी

: रमजान रहमत व बकसीस का महिना‌ है
मौलाना‌‌ वसी अहमद गौसी

रिपोर्ट

परमानन्द पाण्डेय

बड़हरिया सिवान

पाक रमजान माह में रोजेदारों के मन में कई तरह के सवाल उठते हैं। इस सबन्ध में सिवान जिले के हकाम मस्जिद के इमाम मौलाना वसी‌ अहमद‌‌ गौसी ने कहा है कि रोजा दूसरों की मदद करने का जज्बा पैदा करता है। रमजान माह के रोजे की खास अहमियत होती है।
इस्लाम के मोताबिक रमजान के रोजे रखने का फर्ज किए गए हैं। जान बूझ कर रोजा छोडऩे वाला गुनाहगार होगा। अगर कोई शख्स बीमार है, अथवा सफर में हैं तो उसके लिए रोजे में छूट दी गई है। लेकिन बाद में उसे रोजा रखना होगा।
उन्होंने बताया कि जैसे जुमा सभी दिनों का सरदार है । वैसे ही रमजान सभी महीनों का सरदार है। रमजान की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस महीने में कुरआन शरीफ नाजिल किया गया। रमजान को कुरआन का महीना भी कहते हैं। रमजान में ज्यादा से ज्यादा कुरआन शरीफ की तिलावत करनी चाहिए। कुरआन शरीफ को समझ कर पढऩा चाहिए। कुरआन शरीफ पढऩे के साथ उसका तर्जुमा भी पढ़ें। इससे कुरआन शरीफ में दिए अल्लाह के हुक्म को जान सकेंगे।
उन्होंने कहा कि रमजान में जो लोग किसी वजह से रोजा नहीं रख पा रहे हैं, वे खुलेआम कुछ खाने-पीने से परहेज करें,रोजेदार के सामने तो बिलकुल भी कुछ न खाएं। उन्होंने कहा कि रोजा रखने से दूसरों की मदद का जज्बा पैदा होता है। जब हम सारा दिन भूखे प्यासे रहते हैं तो उन गरीब मजदूर बेबस लाचार लोगों की भूख प्यास का भी एहसास होता है। जिनको खाने-पीने को कुछ नहीं मिल पाता है। इस तरह हम उनकी मदद को आगे आते हैं। उन्होंने कहा कि रोजा सिर्फ दिन भर भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है । बल्कि अपने आप को हर बुराई से बचाना है।

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